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MP के सांसदों की ‘मौन राजनीति’—जनता के मुद्दे किसके भरोसे?

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Silent Politics of MP’s MPs — Who Will Raise the People’s Issues?

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल / नई दिल्ली। 18वीं लोकसभा के शुरुआती सत्रों में सांसदों की सक्रियता को लेकर आई एक ताज़ा रिपोर्ट ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि बड़ी जीत के बावजूद कई सांसद संसद में जनता की आवाज उठाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि मध्यप्रदेश के सांसदों का प्रदर्शन बेहद कमजोर सामने आया है।

मध्यप्रदेश के सांसद: मौजूद, लेकिन मौन!

रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश के सांसदों ने औसतन सिर्फ 4 घंटे 23 मिनट 25 सेकंड ही सदन में अपनी बात रखी। यह पूरे देश के कुल बोलने के समय का महज 3.62% है।

और भी चौंकाने वाली बात—
भाजपा के 5 सांसद पूरे सत्र में एक बार भी नहीं बोले।

इनमें शामिल हैं:

  • रोडमल नागर (राजगढ़)
  • हिमाद्री सिंह (शाहडोल)
  • बंटी विवेक साहू
  • जनार्दन मिश्रा
  • महेंद्र सिंह सोलंकी

हैरानी की बात यह है कि इनकी उपस्थिति 100% रही, लेकिन जनता के मुद्दों पर एक शब्द तक नहीं बोले।

सबसे ज्यादा बोलने वाले भी फेल?

मध्यप्रदेश से सबसे ज्यादा बोलने वाले सांसद गणेश सिंह रहे, लेकिन उन्होंने भी कुल मिलाकर सिर्फ करीब 24.49 मिनट ही अपनी बात रखी।

राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा भी बेहद कम माना जा रहा है।

देशभर में भी हाल बेहाल

  • कुल 543 सांसदों में से सिर्फ 425 सांसदों ने ही भागीदारी की
  • 24 सांसद पूरी तरह खामोश रहे
  • कई सांसद प्रश्नकाल में भी निष्क्रिय पाए गए

PRS Legislative Research जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट भी इस गिरते स्तर की पुष्टि करती है।

पार्टी लाइन भारी, जनता के मुद्दे गायब

यह रिपोर्ट भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी सच्चाई सामने लाती है—
अब संसद में पार्टी लाइन और हाईकमान की राजनीति हावी हो चुकी है

जबकि असली मुद्दे—

  • किसान
  • बेरोजगारी
  • स्वास्थ्य सेवाएं
  • शिक्षा
  • जल संकट
  • आदिवासी विकास

ये सब बहस से बाहर होते जा रहे हैं।

सांसद या सिर्फ दर्शक?

मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां लाखों लोग रोज़गार, स्वास्थ्य और खेती की समस्याओं से जूझ रहे हैं, वहां सांसदों का यह मौन कई सवाल खड़े करता है—

  • क्या सांसद सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हैं?
  • क्या जनता की आवाज अब संसद तक पहुंच ही नहीं रही?
  • क्या लोकतंत्र सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है?

लोकतंत्र की खामोशी खतरनाक है

मध्यप्रदेश के ये आंकड़े सिर्फ एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की संसदीय संस्कृति की चेतावनी हैं।

अगर संसद में चुने हुए प्रतिनिधि ही खामोश रहेंगे, तो लोकतंत्र की आवाज कौन उठाएगा?

जनता का सदन, जनता के लिए होना चाहिए—न कि खामोशी या राजनीतिक दिखावे के लिए।

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