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सरपंच से सप्लायर तक रिश्ता! मंडला में रिश्तेदारों के नाम पर चल रहीं फर्जी फर्में.

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Fake supplier firms linked to sarpanch relatives exposed in Mandla village panchayats with material supply scam and zero ground presence

From Sarpanch to Supplier — All in the Family! Fake Firms Running in Relatives’ Names in Mandla.

Source -Revanchal Times, Edited by MP Samwad.

In Mandla’s village councils, fake supplier firms are being operated in the names of sarpanches’ relatives. Payments worth lakhs are made without actual stock, shops, or warehouses. Despite repeated complaints and media exposure, the administration remains inactive. This nexus of power and corruption is weakening grassroots governance.

MP संवाद, मंडला जिले की कई ग्राम पंचायतों में सरकारी योजनाओं के अंतर्गत मटेरियल सप्लाई के नाम पर बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा सामने आया है। कई मामलों में पंचायतों द्वारा ऐसी फर्मों के बिल लगाए जा रहे हैं जिनका ज़मीनी अस्तित्व ही नहीं है। न दुकान, न स्टॉक, न गोदाम—इनका कोई स्थायी पता तक नहीं है, कई बार तो गूगल मैप पर भी इनका कोई अता-पता नहीं मिलता।

कागजों में सब ‘पर्फेक्ट’, जमीन पर ज़ीरो

इन कथित फर्मों के दस्तावेज इतने सलीके से तैयार होते हैं कि उन पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है। जीएसटी नंबर, पैन डिटेल्स, समय पर रिटर्न—सबकुछ वैध दिखाई देता है। लेकिन जब शिकायतकर्ता जमीनी सच्चाई जांचने पहुंचते हैं तो ना स्टॉक मिलता है, ना गोदाम। फिर भी पंचायतें लाखों रुपये का भुगतान इन फर्जी फर्मों को कर देती हैं।

GST विभाग का अजीब तर्क

जब इस गोरखधंधे पर जीएसटी अधिकारियों से सवाल किया गया तो उनका जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा, “हर व्यापारी को दुकान खोलना जरूरी नहीं है। अगर कोई सड़क चलते व्यापार करता है और रिटर्न समय पर भर रहा है तो वह वैध है।”

इस तर्क से सवाल उठता है—जब दुकान ही नहीं, तो सरकारी सामग्री कहां स्टोर की जाती है? सप्लाई का ऑडिट और ट्रैकिंग कैसे होती है?

कुछ सप्लायर न जीएसटी भरते, न जवाब देते

कुछ सप्लायर्स ऐसे भी हैं जो जीएसटी रिटर्न भरते ही नहीं, लेकिन उनके नाम से लाखों का मटेरियल कागजों में सप्लाई होता है। शिकायतों के बावजूद जांच सालों तक चलती है लेकिन कार्रवाई शून्य रहती है।

पंच से सरपंच तक—रिश्तेदारों के नाम फर्म रजिस्टर्ड

यह भ्रष्टाचार केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं है। कई जनप्रतिनिधि खुद या अपने परिजनों के नाम पर सप्लायर फर्में चला रहे हैं। कोई पत्नी के नाम पर, कोई साले के, तो कोई ऐसे नाम पर जिसने शायद खुद कभी आवेदन ही नहीं किया। इस सप्लाई रैकेट में राजनीति और भ्रष्टाचार का मजबूत गठजोड़ काम कर रहा है।

शिकायतें, रिपोर्टिंग… पर कार्रवाई नहीं

ग्रामीण लगातार शिकायतें कर रहे हैं, मीडिया में समाचार प्रकाशित हो रहे हैं। फोटो, दस्तावेज, बिल, फर्जी पते—सबूतों की भरमार है, लेकिन प्रशासन की आंखें बंद हैं। कागजों में सब ‘ठीक’ है, इसलिए जमीनी भ्रष्टाचार को अनदेखा किया जा रहा है।

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