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शैडो वन मंत्री की कार्यशैली से विधायकों एवं कार्यकर्ताओं में नाराजगी

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भोपाल। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने नागर सिंह चौहान को वन मंत्री बनाया। चौहान भानमती तो बन गए किंतु उनका मंत्रालय अपर संचालक स्तर के वित्तीय सेवा के अधिकारी रंजीत सिंह चौहान संचालित कर रहे हैं। जंगल महक में उन्हें शैडो वन मंत्री के रूप में देखा जा रहा है। विभाग में सप्लायर का वर्क आर्डर जारी करना हो या फिर ट्रांसफर पोस्टिंग, ये सभी कार्य अधिकारियों से मिलकर वह स्वयं कर रहे हैं। यही कारण है कि विधायकों और बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं की सिफारिशी तबादला आदेश चुनाव आचार संहिता लगने के पूर्व जारी नहीं हो सके।

वन विभाग में अधिकांश अधिकारी वन मंत्री चौहान के अनादिकृत ओएसडी रणजीत सिंह चौहान को शैडो मंत्री के रूप में देखते हैं। फील्ड में पदस्थ डीएफओ यह मानते हैं कि रणजीत सिंह चौहान उनके नजदीकी है। उनकी मान्यताओं पर तब और बल मिलता है जब अधिकारी अपने मंत्री से मिलने जाते हैं और वे उन्हें चौहान की से मिलने का संकेत दे देते हैं। इसके कारण ही विभाग के अवसर उन्हें शैडो वन मंत्री के रूप में देखते हैं। अब नेताओं को भी ऐसा एहसास होने लगा है वह इसलिए कि धार, झाबुआ और अलीराजपुर के विधायकों एवं नेताओं ने वन विभाग के डीएफओ, एसडीओ से लेकर रेंजरों को हटाने और उनकी प्राइम पोस्टिंग करने के सिफारिश की थी। वन मंत्री चौहान ने विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से मंथन कर सूची तैयार कर मंत्रालय को भेजी। इस बीच पार्टी हाई कमान ने उनकी पत्नी अनीता सिंह चौहान को झाबुआ-रतलाम लोकसभा का प्रत्याशी घोषित कर दिया। इस घोषणा के बाद वन मंत्री नागर सिंह चौहान राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त हो गए और इसका लाभ उठाते हुए विधायकों के सिफारिश वाले अधिकारियों के तबादले की सूची में नाम हटाकर चौहान ने अपने पसंदीदा डीएफओ, एसडीओ और रेंजरों के तबादला आदेश आचार संहिता लगने के चंद्र घंटे पहले जारी करवा दिए। वन मंत्री के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि विधायकों और नेताओं की अनुशंसा वाले दबा दें आदेश जारी नहीं होने के कारण वन मंत्री के प्रति नाराजगी है और वे चुनाव बाद मुख्यमंत्री मोहन सिंह यादव से शिकायत करने का मन बनाया है।

सप्लायर के कारोबार में भी है दखलअंदाजी
वन विभाग में लंबे समय से सप्लायर का एक नेक्सस सक्रिय है। इस सिंडिकेट से वन मंत्री चौहान के अनाधिकृत ओएसडी चौहान भी जुड़ गए है। दबाव के चलते ही महकमे में एक दर्जन से अधिक डीएफओ ने चैन लिंक और वायरबेड खरीदी की निविदा में ऐसी शर्त जोड़ दी, जिसे केवल चौहान के नजदीकी फर्म को ही वर्क आर्डर मिल सके। बताया जाता है कि डीएफओ को फोन करके अपने चहेते फर्म को ठेका दिलवाने के लिए नई-नई शर्ते जुड़वा रहे हैं। दक्षिण सागर,बैतूल और बालाघाट समेत एक दर्जन डीएफओ ने चैनलिंक और वायरबेड खरीदी के लिए निविदा आमंत्रित बुलाई गई। इस निविदा में 3 करोड़ के टर्न-ओवर के साथ यह शर्त भी जोड़ दी कि भारत मानक ब्यूरो से मान्यता प्राप्त फर्म ही निविदा में हिस्सा ले सकेंगी। यह शर्त पहली बार जोड़ी गई। इस शर्त के कारण तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गई। मप्र में भारतीय मानक ब्यूरो से लाइसेंस प्राप्त दो फर्म ही रजिस्टर्ड हैं। यह दोनों फर्म ही कांग्रेस नेता के रिश्तेदार की है। यानी कांग्रेस नेता के रिश्तेदार को उपकृत करने के लिए प्रदेश के एक दर्जन डीएफओ ने पहली बार यह शर्त निविदा में जोड़ दी है। यह बात अलग है कि प्रतिस्पर्धा से बाहर हुई संस्थाओं ने शिकवे-शिकायतें शुरू कर दी हैं। जानकारों का कहना है कि मंत्री के यहां अनाधिकृत रूप से सक्रिय अपर संचालक स्तर के एक अधिकारी के कहने पर फील्ड के अफसरों ने निविदा में भारतीय मानक ब्यूरो की शर्त जोड़ी है। बताया जाता है कि अफसर पर दबाव बनाने वाले अनाधिकृत काम देख रहे अधिकारी का कांग्रेस नेताओं से पुराने संबंध रहे हैं।

क्या है रंजीत सिंह चौहान का बैकग्राउंड
रणजीत सिंह चौहान वित्तीय सेवा के अधिकारी

  • अपर संचालक स्तर के अधिकारी वन मंत्री नागर सिंह चौहान के पहले 2018-19 में तत्कालीन अपर प्रमुख सचिव वन केके सिंह चौहान के वित्तीय सलाह रहे थे. तब इन्होंने विभाग मुखिया पर दबाव बनाकर सियाज़ लक्सरी कार के लिए बालहठ कर बैठे थे पर अफसर ने उनकी एक न सुनी।
  • केके सिंह वन मंत्रालय से हट गए और उनकी जगह पर एसीएस एपी श्रीवास्तव आए. श्रीवास्तव ने आते ही रणजीत सिंह चौहान को वित्तीय सलाहकार से हटा दिया।
  • इसके बाद वह वन मंत्री उमंग सिंघार के स्टाफ में घुसपैठ की. यहां भी आते ही उमंग सिंघार से कार के लिए नोटशीट लिखवाई। सिंघार को उनके स्टाफ ने केके सिंह की घटना की बात बताई. यहां भी बात नहीं बनी.
  • एपी श्रीवास्तव को नीचा दिखाने के लिए चौहान ने उमंग सिंगार को बिजनेस रूल का हवाला देते हुए एसीएस और सचिव के बीच गलत ढंग से कार्यों का विभाजन करवाया, जिसका जमकर विरोध हुआ और अफसर और मंत्री के बीच में तनाव की लकीर खींच गई. कोमो बेस्ट यही स्थिति वर्तमान वन मंत्री के साथ चौहान निर्मित कर सकते हैं. रेस्ट हाउस के मामले में नोट की लिख कर एक बार प्रशासनिक किरकिरी करवा चुके हैं.
  • उमंग सिंगार के बंगले से चौहान को हटाया इसलिए गया कि एस श्रीनिवास मूर्ति जैव विविधता के सदस्य सचिव ने लिखित शिकायत की थी।
  • वर्तमान में सभी डीएफओ को सप्लायर के लिए दबाव बना रहे हैं। स्वयंभू ओएसडी बताते हुए चौहान डीएफओ को मोबाइल पर बताते हैं कि मैं जिसे भेजो उसे वर्क आर्डर देना.
  • रणजीत सिंह चौहान अपने मूल विभाग से गायब होकर मंत्री की सेवा में लगे हैं अब सवाल यह उठता है कि जब वह ऑफिस में काम नहीं कर रहे हैं तो उनका वेतन कहां से निकल रहा है..

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