कोयला गैसीफिकेशन: रोजगार का वादा या जोखिम भरा प्रयोग?
Coal Gasification: A Promise of Jobs or a Risky Experiment?

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, भोपाल। भारत सरकार ने कोयला और लिग्नाइट गैसीफिकेशन परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता योजना को मंजूरी दी है। सरकार का दावा है कि इससे आयातित ईंधन, यूरिया, अमोनिया और मेथेनॉल पर निर्भरता कम होगी, जबकि आलोचक इसे भारी सब्सिडी के सहारे कॉरपोरेट निवेश को बढ़ावा देने वाला जोखिमपूर्ण प्रयोग बता रहे हैं।
यह योजना Government of India के National Coal Gasification Mission का विस्तार है, जिसे 2021 में शुरू किया गया था। लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैसीफिकेशन किया जाए।
क्या है कोयला गैसीफिकेशन?
कोयला गैसीफिकेशन वह तकनीक है जिसमें घरेलू कोयले को सिंथेसिस गैस (Syngas) में बदला जाता है। इस गैस का उपयोग उर्वरक, रसायन, मेथेनॉल और स्वच्छ ईंधन उत्पादन में किया जा सकता है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।
3 लाख करोड़ तक निवेश, 50 हजार रोजगार का दावा
सरकार के अनुसार इस योजना से 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये तक का कुल निवेश आकर्षित हो सकता है और लगभग 50,000 प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की संभावना है। योजना के तहत प्लांट और मशीनरी लागत पर 20 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाएगा।
अडानी समेत बड़े उद्योग समूहों की सक्रियता
Adani Group महाराष्ट्र के नागपुर में लगभग 70,000 करोड़ रुपये और ओडिशा में 84,000 करोड़ रुपये के कोल-टू-केमिकल्स प्रोजेक्ट्स पर कार्य कर रहा है। इसके अलावा Coal India Limited, Bharat Heavy Electricals Limited तथा Talcher Fertilizers Limited जैसी संस्थाएं भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
तकनीकी चुनौती: भारतीय कोयले में 45% तक राख
भारतीय कोयले में 28 से 45 प्रतिशत तक राख (Ash Content) पाई जाती है, जिससे गैसीफिकेशन प्रक्रिया जटिल और महंगी हो सकती है। अमेरिका की Kemper परियोजना जैसी कुछ अंतरराष्ट्रीय परियोजनाएं अत्यधिक लागत और तकनीकी कठिनाइयों के कारण विवादों में रही हैं।
पर्यावरणीय चिंता: पानी की भारी खपत और कार्बन उत्सर्जन
विशेषज्ञों के अनुसार गैसीफिकेशन परियोजनाओं में पानी की खपत अधिक होती है, जो जल-संकट वाले क्षेत्रों में गंभीर चिंता का विषय बन सकती है। साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। हालांकि सरकार इसे ‘Cleaner Coal Utilization’ का मॉडल बता रही है।
समर्थक बनाम आलोचक
समर्थकों का कहना है कि यह योजना आयात बिल घटाने, रोजगार बढ़ाने और औद्योगिक विकास को गति देने में सहायक होगी। वहीं आलोचकों का आरोप है कि भारी सब्सिडी के जरिए कुछ बड़े उद्योग समूहों को लाभ पहुंचाने का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
सफलता की शर्त: पारदर्शिता और जवाबदेही
विशेषज्ञों का मानना है कि इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, कठोर पर्यावरणीय मानकों, जल प्रबंधन और पारदर्शी निगरानी पर निर्भर करेगी। Comptroller and Auditor General of India (CAG) जैसी संस्थाओं की निगरानी से जवाबदेही और मजबूत हो सकती है।
बड़ा सवाल
क्या 37,500 करोड़ रुपये की यह योजना भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगी, या फिर यह ‘क्लीन कोल’ के नाम पर एक महंगा और पर्यावरणीय जोखिम से भरा प्रयोग साबित होगी? आने वाले वर्षों में यही इस नीति की असली परीक्षा होगी।