3 या 19? बिरसा में बच्चों की मौतों पर बड़ा सवाल—सरकारी आंकड़े और विधायक का दावा आमने-सामने.
3 or 19? Big Question Over Child Deaths in Birsa—Government Figures and MLA’s Claim Clash.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल, बालाघाट जिले के बिरसा और बैहर क्षेत्र के बैगा बाहुल्य गांवों में बच्चों के बीच बीमारी का मामला अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं रह गया है, बल्कि मौतों के आंकड़ों को लेकर सरकारी दावों और राजनीतिक आरोपों के बीच बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
कुंडेकसा, बोंदारी, कोरका, मछुरदा, अडोरी और आसपास के गांवों में पिछले कई सप्ताह से बच्चों में तेज बुखार, शरीर पर दाने-चकत्ते, दर्द, मलेरिया, दस्त और चर्मरोग जैसी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती रही हैं। शुरुआती रिपोर्टों में स्वास्थ्य विभाग ने तीन बच्चों की मौत की पुष्टि की थी, जबकि स्थानीय स्तर पर इससे अधिक मौतों के दावे सामने आए थे।
अब 14 अगस्त को बैहर विधायक एवं जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष संजय उइके ने 19 बच्चों की मौत का दावा कर मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। विधायक ने आरोप लगाया कि कुपोषण और दूषित पेयजल के कारण बच्चों की मौत हुई है और सरकार वास्तविक आंकड़े सामने नहीं ला रही है।
हालांकि, 19 मौतों के इस दावे की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक स्वास्थ्य विभागीय पुष्टि इस उपलब्ध सामग्री में नहीं है। यही वजह है कि इस पूरे मामले में अब गांव-वार मृत्यु की जांच और प्रत्येक मामले का मेडिकल ऑडिट बेहद जरूरी हो गया है।
बीमारी का दायरा बढ़ा या जांच का दायरा?
13 अगस्त तक स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रभावित गांवों से 117 बच्चों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इनमें से 97 बच्चे स्वस्थ होकर घर लौट चुके थे और 20 बच्चों का उपचार जारी था।
इसी दौरान 12 जुलाई से शुरू किए गए घर-घर सर्वे में 13 अगस्त तक 2,220 लोगों की जांच की गई। इनमें 190 मलेरिया, 98 दस्त, 88 दाने के साथ बुखार और 143 चर्मरोग के मरीज पाए गए। कुल 519 मरीजों में से 402 का घर पर उपचार किया गया था।
16 अगस्त की दैनिक रिपोर्ट में सर्वे का आंकड़ा बढ़कर 2,882 लोगों तक पहुंच गया। इनमें कुल 630 मरीज चिन्हित किए गए। मलेरिया के 241, दस्त के 127, दाने के साथ बुखार के 102 और चर्मरोग के 160 मरीज बताए गए।
इन आंकड़ों से साफ है कि स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्र में निगरानी का दायरा बढ़ाया है। लेकिन बीमारी की वास्तविक वजह और मौतों के आंकड़े को लेकर अभी भी सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
20 टीमें, 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस मैदान में
प्रशासन ने स्थिति से निपटने के लिए 20 सर्वे टीम, 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस तैनात की हैं। घर-घर जाकर स्वास्थ्य परीक्षण, दवा वितरण और जरूरत पड़ने पर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की कार्रवाई जारी है।
15 अगस्त तक 152 मरीजों को बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल भेजे जाने की जानकारी दी गई थी। इनमें 100 मरीज स्वस्थ होकर डिस्चार्ज किए जा चुके थे, जबकि 52 का उपचार जारी था।
16 अगस्त की रिपोर्ट में 169 मरीजों को अस्पताल में भर्ती किए जाने और 125 के स्वस्थ होकर लौटने की जानकारी दी गई। 44 मरीजों का उपचार जारी बताया गया। इसी दिन 25 बच्चों को स्वस्थ होने के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज कर घर पहुंचाया गया।
बच्चों को विटामिन-ए, ओआरएस, जिंक, आयरन सिरप, एल्बेंडाजोल और मीजल्स की डोज भी दी जा रही है।
सरकारी आंकड़े और विधायक के दावे में इतना बड़ा अंतर क्यों?
14 अगस्त को पत्रकार वार्ता में विधायक संजय उइके ने बोंदारी में 7, मछुरदा में 7, कुंडेकसा में 2 और घुम्मुर में 2 बच्चों की मौत का दावा किया। उन्होंने अन्य गांवों से भी बच्चों की मौत की जानकारी मिलने की बात कही।
विधायक की ओर से मृत बच्चों की एक सूची भी उपलब्ध कराई गई, जिसमें बोंदारी, कोहनीमोड़टोला, पटेलटोला कुंडेकसा, कुंडेकसा, मातला, मछुरदा, गठिया, कोरका, टेंडुदेही, चिखली खैरटोला और कोडबिरकोना सहित विभिन्न गांवों के नाम शामिल हैं।
दूसरी ओर, इससे पहले स्वास्थ्य विभाग की ओर से तीन बच्चों की मौत की पुष्टि की जानकारी सामने आई थी। स्थानीय प्रतिनिधियों ने भी सरकारी आंकड़ों से अधिक मौतों का दावा किया था, लेकिन उन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी।
यही अंतर अब सबसे बड़ा सवाल है—आखिर प्रभावित गांवों में कितनी बच्चों की मौत हुई है और उनकी वास्तविक वजह क्या थी?
अंधविश्वास, दूषित पानी और कुपोषण के आरोप—जांच जरूरी
प्रभावित बैगा गांवों में बीमारी के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और अंधविश्वास की चुनौती भी सामने आई है। पहले की रिपोर्टों में स्थानीय लोगों द्वारा बीमारी को दैविक प्रकोप मानकर झाड़-फूंक का सहारा लेने की बात सामने आई थी।
14 अगस्त को विधायक संजय उइके ने कुपोषण और दूषित पेयजल को बच्चों की मौत से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए। लेकिन इन कारणों को मृत्यु का प्रमाणित कारण मानने से पहले चिकित्सकीय और वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल स्रोतों का क्लोरीनेशन, ब्लीचिंग, जल नमूने, हैंडपंप मरम्मत, फॉगिंग और सफाई अभियान भी चलाया है। आंगनबाड़ी, स्कूलों और छात्रावासों में भी स्वच्छता और पोषण व्यवस्था की निगरानी की जा रही है।
अब सबसे जरूरी है मौतों का स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि हर मौत की चिकित्सकीय सच्चाई सामने लाना है।
यदि 19 बच्चों की मौत का दावा किया गया है, तो प्रशासन को गांव-वार मृतकों की सूची का सत्यापन करना चाहिए। प्रत्येक मृत्यु की मेडिकल हिस्ट्री, अस्पताल रिकॉर्ड, पोस्टमॉर्टम/मेडिकल प्रमाण, बीमारी के लक्षण, उपचार और मृत्यु के संभावित कारण की जांच सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जानी चाहिए।
इसी तरह यदि सरकारी आंकड़ा तीन मौतों का है, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि बाकी मृतकों के संबंध में सामने आए दावों की जांच किस स्तर पर हुई और उनका आधिकारिक रिकॉर्ड क्या कहता है।
क्योंकि बीमारी से लड़ाई तभी प्रभावी होगी, जब आंकड़े भी बीमारी की तरह छिपे न रहें।
MP संवाद समाचार के सवाल
क्या प्रभावित गांवों में हुई सभी बच्चों की मौतों का गांव-वार सत्यापन हुआ है?
क्या प्रत्येक मृत्यु का मेडिकल ऑडिट कराया गया है?
क्या पेयजल और कुपोषण को मृत्यु के कारणों से जोड़ने के लिए वैज्ञानिक जांच हुई है?
और सबसे बड़ा सवाल—सरकारी आंकड़ों और विधायक द्वारा बताए गए 19 मौतों के आंकड़े के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है?
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग का सर्वे और उपचार अभियान जारी है। लेकिन प्रभावित बैगा गांवों के परिवारों के लिए सिर्फ अस्पताल और दवाएं नहीं, बल्कि बीमारी की वास्तविक वजह और हर मौत की सच्चाई सामने आना भी उतना ही जरूरी है।
Legal Disclaimer
This report presents official figures and attributed political claims separately; unverified allegations are not treated as established facts without independent confirmation.