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157वें नंबर की पत्रकारिता, 95 लाख शिक्षकों को दे रही ज्ञान!

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Ranked 157th in Press Freedom, Yet Lecturing 9.5 Million Teachers!

MP संवाद समाचार, भोपाल

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

भोपाल, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर दर्ज हुआ है। दूसरी ओर नॉर्वे लगातार दसवें वर्ष शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) की रिपोर्ट के अनुसार भारत का राजनीतिक संकेतक 160वें और सुरक्षा संकेतक 158वें स्थान पर है।

ऐसे समय में जब भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर वैश्विक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं, देश के कुछ टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर शिक्षकों को ‘ज्ञान’ देने और उनकी भूमिका पर सवाल उठाने में व्यस्त दिखाई देते हैं।

जिन शिक्षकों ने देश गढ़ा, उन्हीं की ‘औकात’ बताई जा रही?

भारत में लगभग 95 लाख से 1 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। यही शिक्षक करोड़ों बच्चों को शिक्षा देकर देश का भविष्य तैयार करते हैं।

हर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, न्यायाधीश, आईएएस, आईपीएस अधिकारी और यहां तक कि टीवी एंकर भी किसी न किसी शिक्षक की कक्षा से ही निकलकर समाज में अपनी पहचान बनाते हैं।

इसके बावजूद जब शिक्षक समुदाय पर अपमानजनक टिप्पणियां की जाती हैं, तो यह केवल एक पेशे का नहीं बल्कि पूरे ज्ञान तंत्र का अपमान माना जाता है।

शिक्षक बनाम स्टूडियो: कौन गढ़ता है भविष्य?

आलोचकों का तर्क है कि जिस मीडिया की वैश्विक रैंकिंग 157वें स्थान पर है, वह शिक्षकों की योग्यता और सम्मान पर सवाल उठा रहा है।

यह वैसा ही है जैसे परीक्षा में असफल छात्र पूरी कक्षा को सफलता का पाठ पढ़ाने लगे।

राष्ट्र निर्माण की असली प्रयोगशाला टीवी स्टूडियो नहीं, बल्कि स्कूल और कॉलेज हैं, जहां आने वाली पीढ़ियों का निर्माण होता है।

कोविड काल में किसने संभाली शिक्षा की कमान?

कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के दौरान जब पूरा देश घरों में बंद था, तब लाखों शिक्षकों ने अपने निजी संसाधनों से मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर ऑनलाइन कक्षाएं संचालित कीं।

दूरदराज गांवों तक शिक्षा पहुंचाने के लिए शिक्षकों ने अभूतपूर्व प्रयास किए। उस दौर में शिक्षा व्यवस्था को जीवित रखने में शिक्षक समुदाय की भूमिका निर्णायक रही।

इतिहास गवाह है: शिक्षक ही राष्ट्र निर्माण की धुरी रहे

भारतीय शिक्षा व्यवस्था का इतिहास बताता है कि शिक्षा को हमेशा राष्ट्र निर्माण का आधार माना गया है।

  • 1835 की मैकाले शिक्षा नीति
  • 1882 का हंटर आयोग
  • 1948 का राधाकृष्णन आयोग
  • 1964 का कोठारी आयोग

इन सभी ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय शक्ति माना।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने शिक्षक को “राष्ट्र की आत्मा” कहा था। वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा को “शेरनी का दूध” बताया था। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार माना।

मीडिया की प्राथमिकताएं सवालों के घेरे में

आलोचकों का आरोप है कि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई गंभीर मुद्दों पर मीडिया का एक वर्ग अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाता।

पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं, शिक्षकों के रिक्त पद, बेरोजगारी और शिक्षा बजट जैसे विषय अक्सर चर्चा से बाहर रह जाते हैं। लेकिन जब शिक्षकों की आलोचना का अवसर आता है, तो स्टूडियो की बहसें अचानक तेज हो जाती हैं।

इसी वजह से मीडिया की प्राथमिकताओं और उसकी जवाबदेही पर भी सवाल उठने लगे हैं।

पत्रकारिता या प्रवक्तावाद?

RSF की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण बढ़ रहा है और राजनीतिक दबावों को लेकर चिंताएं मौजूद हैं।

ऐसे में आलोचक सवाल पूछ रहे हैं कि क्या पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल करना है या फिर चुनिंदा वर्गों को निशाना बनाना?

राष्ट्र स्कूलों से बनते हैं, स्टूडियो से नहीं

लोकतंत्र में मीडिया और शिक्षा दोनों महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। दोनों की गरिमा, स्वतंत्रता और जवाबदेही समान रूप से आवश्यक है।

लेकिन यदि शिक्षक समुदाय को लगातार निशाना बनाया जाता है, तो यह बहस केवल शिक्षकों की नहीं, बल्कि समाज के ज्ञान और लोकतांत्रिक मूल्यों की भी बन जाती है।

राष्ट्र की नींव स्कूलों में रखी जाती है। भविष्य ब्लैकबोर्ड पर लिखा जाता है, टेलीप्रॉम्प्टर पर नहीं।

(नोट: यह लेख सार्वजनिक विमर्श और विभिन्न मतों पर आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। मीडिया और शिक्षा दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।)

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