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मीठा जहर या ठंडा पेय? सरकार के दोहरे मापदंड उजागर.

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Sweet poison or soft drink? Government’s double standards exposed.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल। देश की नीतियों का केंद्र माने जाने वाले संसद भवन में साल 2003 से कोल्ड ड्रिंक्स (कोका-कोला, पेप्सी, थम्स अप, स्प्राइट सहित सभी एरेटेड ड्रिंक्स) पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। संसद परिसर की कैंटीनों में ये पेय न बिकते हैं, न परोसे जाते हैं। लेकिन वही ड्रिंक्स देशभर में खुलेआम बिक रहे हैं—गली-मोहल्लों, स्कूलों, मॉल, रेलवे स्टेशन हर जगह। यह दोहरा मापदंड अब गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

2003 की रिपोर्ट और संसद में तत्काल बैन

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की 2003 की रिपोर्ट में इन पेयों में कीटनाशक अवशेष पाए गए थे। इसके बाद संसद की संयुक्त खाद्य प्रबंधन समिति ने तत्काल प्रभाव से इन पर प्रतिबंध लगा दिया। उद्देश्य साफ था—सांसदों और स्टाफ की सेहत की सुरक्षा।

23 साल बाद भी बैन कायम, लेकिन जनता के लिए छूट क्यों?

2026 तक संसद कैंटीनों में यह प्रतिबंध जारी है। वहां हेल्दी विकल्प जैसे मिलेट्स, सलाद और लो-कैलोरी भोजन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
लेकिन सवाल यह है—जब ये पेय सांसदों के लिए हानिकारक हैं, तो 140 करोड़ नागरिकों के लिए सुरक्षित कैसे हो गए?

विधानसभाओं में ढील, बाजार में कंपनियों का दबदबा

2006 में कुछ राज्यों की विधानसभाओं में भी अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए थे, लेकिन वर्तमान में अधिकतर जगह यह प्रभावी नहीं है। दूसरी ओर, बाजार में इन कंपनियों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है।

FSSAI के नियम: जानकारी है, लेकिन सख्ती नहीं

खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पेयों के लिए मानक और लेबलिंग नियम तय किए हैं, जिनमें शुगर और RDA की जानकारी देना अनिवार्य है।
लेकिन सवाल यह है—जब संसद में सीधा बैन है, तो जनता के लिए सिर्फ “जानकारी” ही क्यों?

स्वास्थ्य पर असर: आंकड़े डराने वाले

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भारत में करोड़ों लोग डायबिटीज और मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं।
एक सामान्य कोल्ड ड्रिंक की बोतल में 8-12 चम्मच तक चीनी होती है। नियमित सेवन से यह “मीठा जहर” बन सकता है, खासकर बच्चों और युवाओं के लिए।

विज्ञापन का जाल: युवाओं को निशाना

बड़ी कंपनियां करोड़ों रुपये खर्च कर विज्ञापनों के जरिए युवाओं को आकर्षित करती हैं। आसान उपलब्धता और आक्रामक मार्केटिंग के चलते यह पेय अब रोजमर्रा की आदत बन चुका है।

जनहित में उठी मांग: नीति में बदलाव जरूरी

विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों की मांग है:

  • स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों के आसपास बिक्री पर रोक लगे
  • हाई-शुगर ड्रिंक्स पर चेतावनी लेबल अनिवार्य हो
  • अतिरिक्त टैक्स लगाकर स्वास्थ्य जागरूकता पर खर्च हो
  • छाछ, लस्सी, नारियल पानी जैसे स्वदेशी विकल्पों को बढ़ावा मिले

“VIP सेफ्टी, जनता रिस्क में?”

यह मामला सिर्फ कोल्ड ड्रिंक्स का नहीं, बल्कि नीति के दोहरे मापदंड का है। जहां सत्ता के गलियारों में सेहत की सुरक्षा सुनिश्चित है, वहीं आम जनता को बाजार की “आजादी” के नाम पर जोखिम में छोड़ दिया गया है।

👉 अब फैसला जनता को करना है—“ठंडक” चुनें या “स्वास्थ्य”।

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