हिंदी MBBS: घोषणा बड़ी, मांग छोटी! गोदाम में किताबें और छात्रों का अंग्रेजी पर भरोसा.
Hindi MBBS: Big Announcement, Low Demand! Books Languish in Warehouses as Students Continue to Trust English.

Special Correspondent, Richa Tiwari, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, भोपाल। हिंदी को उच्च शिक्षा की भाषा बनाने का मध्यप्रदेश का प्रयोग अब एक बड़े सवाल के सामने खड़ा दिखाई दे रहा है। वर्ष 2022 में प्रदेश में हिंदी माध्यम से MBBS की पढ़ाई शुरू की गई थी। इसे मेडिकल शिक्षा को मातृभाषा से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था। लेकिन चार साल बाद सामने आई एक रिपोर्ट इस प्रयोग की जमीनी तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
आजतक की 14 सितंबर 2026 की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, हिंदी में MBBS की किताबें तैयार कराने और प्रकाशित करने पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन इन पुस्तकों की मांग उम्मीद के मुताबिक नहीं बन पाई। रिपोर्ट में भोपाल के एक प्रकाशक के हवाले से बताया गया है कि लगभग ₹9 करोड़ की करीब 2,500 हिंदी मेडिकल किताबें अब भी गोदाम में पड़ी हैं।
करोड़ों का निवेश, लेकिन किताबों को नहीं मिले पाठक
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 में हिंदी मेडिकल पुस्तकों के प्रकाशन की जिम्मेदारी मिलने के बाद एक प्रकाशक ने करीब ₹12 से ₹13 करोड़ का निवेश किया और लगभग 5,000 किताबें प्रकाशित कीं। लेकिन मेडिकल कॉलेजों से मांग कम रहने के कारण बड़ी संख्या में किताबें बिक नहीं सकीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार ने हिंदी में मेडिकल शिक्षा शुरू करने का फैसला किया था, तो क्या उससे पहले छात्रों, शिक्षकों और मेडिकल कॉलेजों की वास्तविक जरूरतों का पर्याप्त आकलन किया गया था?
किताबें तैयार करना एक चरण था, लेकिन उन्हें छात्रों तक पहुंचाना, शिक्षकों को हिंदी माध्यम में सहज बनाना और मेडिकल शिक्षा का पूरा हिंदी इकोसिस्टम तैयार करना उससे कहीं बड़ी चुनौती साबित हो रही है।
90 फीसदी छात्रों ने अंग्रेजी को क्यों चुना?
रिपोर्ट में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में हिंदी MBBS पाठ्यक्रम के बावजूद एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी, जबकि 2025-26 में लगभग 10 फीसदी मेडिकल छात्रों ने ही हिंदी में परीक्षा दी। यानी करीब 90 फीसदी छात्रों ने अंग्रेजी को प्राथमिकता दी।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण छात्रों की करियर चिंता बताई जा रही है। MBBS के बाद PG, रिसर्च, मेडिकल जर्नल्स और अंतरराष्ट्रीय मेडिकल साहित्य में अंग्रेजी का दबदबा है। ऐसे में छात्र यह सोचने को मजबूर हैं कि अगर आगे की पढ़ाई और करियर के लिए अंग्रेजी जरूरी है, तो मेडिकल की शुरुआती पढ़ाई भी उसी भाषा में क्यों न की जाए?
मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रोफेसर डॉ. अशोक खंडेलवाल ने भी माना कि हिंदी में मेडिकल साहित्य अभी अंग्रेजी की तुलना में उतना मजबूत नहीं है। हालांकि उनका कहना है कि हिंदी मेडिकल साहित्य धीरे-धीरे विकसित हो रहा है।
हिंदी मेडिकल शिक्षा के सामने असली चुनौती क्या?
हिंदी में MBBS शुरू करना सिर्फ किताबों का अनुवाद करने तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए मेडिकल शब्दावली, गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री, प्रशिक्षित शिक्षक, रिसर्च पेपर, डिजिटल कंटेंट और आगे की पढ़ाई के अवसरों का मजबूत नेटवर्क जरूरी है।
अगर छात्र हिंदी में पढ़ाई करने के बाद PG और रिसर्च के स्तर पर अंग्रेजी की किताबों और जर्नल्स पर निर्भर रहने को मजबूर हैं, तो हिंदी माध्यम को लेकर उनकी झिझक स्वाभाविक है।
सवाल यह नहीं है कि मेडिकल शिक्षा हिंदी में होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या हिंदी को मेडिकल शिक्षा की पूरी व्यवस्था में सक्षम बनाने की तैयारी हुई है?
चार साल बाद अगर करोड़ों रुपये की किताबें गोदामों में पड़ी हैं और अधिकांश छात्र अंग्रेजी को चुन रहे हैं, तो हिंदी MBBS प्रयोग की सफलता को केवल घोषणा या किताबों की छपाई से नहीं, बल्कि छात्रों की पसंद, शिक्षा की गुणवत्ता और उनके भविष्य के करियर परिणामों से मापना होगा।
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