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कमीशन खोरी पर ब्रेक लगाने एमडी ने लिया बड़ा फैसला, अब प्राइवेट फर्म से नहीं होगी खरीदी

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MD took a big decision to put a stop to commission embezzlement, now purchases will not be made from private firms

  • एपीसीसीसीएफ के पत्र पर शुरू नहीं जांच,

भोपाल। लघु वनोपज संघ के प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केंद्र में लंबे समय से चली आ रही कमीशन खोरी पर ब्रेक लगाने के लिए प्रबंध संचालक बिभास ठाकुर ने बड़ा फैसला लिया है। ठाकुर ने तय किया है कि वन मेले में होने वाले क्रेता-विक्रेता सम्मेलन में अब निजी फर्म हिस्सा नहीं लेंगे। यानी अब खरीदी जिला वनोपज समितियों से ही होगी। संघ के प्रबंध संचालक ने यह निर्णय ऑडिट आपत्ति के बाद लिया है।
संघ के एमडी विभाष ठाकुर द्वारा वन मेले में क्रेता विक्रेता अनुबंध में वनोपज समिति और वन धन केंद्रों से ही अनुबंध किया गया है। जबकि पहले प्राइवेट सप्लायर से भी अनुबंध कर के उन्हीं से ख़रीदी को प्राथमिकता दी जाती थी।
पिछले 5 सालों का रिकॉर्ड देखे तो अनुबंधों में सबसे ज़्यादा ख़रीदी आर्यन फार्मेसी से की गई और तो और शहद जो की मध्यप्रदेश में वनसमिति संग्रहण करती है उसके बाद भी अदिति ट्रेडर्स राजस्थान से शहद ख़रीदा गया। आडिट रिपोर्ट में ख़रीदी प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति ली गई है।लैब रिपोर्ट में कई फ़ार्मो के रॉ-मटेरियल ख़राब होने के बाद भी ख़रीदी कर भुगतान कर दिया गया।
सूत्रों ने बताया कि पिछले वित्तीय वर्षों के आडिट आपत्तियों में गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर प्रसंस्करण केंद्र के सीईओ और एमडी का ध्यान आकर्षित कराया गया है। मसलन, मशीन के रखरखाव पर एक साल में ढाई करोड रुपए का भुगतान किया गया है। कहते हैं कि इतने में तो नई मशीन आ जाती। मशीन के मेंटेनेंस का ठेका भी 3-4 सालों से एक ही फर्म को दिया जा रहा है। ऑडिट में इस बात को लेकर भी आपत्ति की गई है कि पिछले वर्ष के वन मेले में संपन्न क्रेता-विक्रेता सम्मेलन में क्रय अनुबंध प्राथमिक समितियां से किया गया। जबकि 80 लाख से अधिक की आयुर्वेद औषधि के लिए रॉ मटेरियल की खरीदी आर्यन फार्मेसी से की गई। यही नहीं, जब स्टॉक वेरिफिकेशन और उसके पेमेंट का लेखा-जोखा देखा तो ऑडिट टीम के सदस्यों की आंखें फटी रह गई। प्लास्टिक से बने डिब्बे वगैरह भी आयर्न फर्म से खरीदे गए हैं। ऑडिट रिपोर्ट में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि निजी फर्म से हुई खरीदी के भुगतान टुकड़ों- टुकड़ों में एक ही तारीख में हुआ है। यह सिलसिला पिछले तीन-चार सालों से जारी है। गंभीर वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद मौजूदा प्रबंध संचालक विभाग ठाकुर ने निर्णय लिया है कि अब वन मेला में आयोजित क्रेता विक्रेता सम्मेलन में अधिकारियों कर्मचारियों के चहेते निजी फर्म को हिस्सा नहीं लेंगे। संघ में सदस्य अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक मनोज अग्रवाल ने भी 5 वर्षों में व्याप्त गड़बड़झाले की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए एक तीखा पत्र लिखा है। पत्र से केंद्र के अधिकारियों में हड़कंप है।

जांच कहां से शुरू करें संशय में है सीईओ

लघु वनोपज संघ में पदस्थ एपीपीसीएफ मनोज अग्रवाल के पत्र के बाद प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केंद्र के सीईओ पीजी फुलजले असमंजस मैं पड़ गए हैं की जांच कहां से शुरू करें..?, क्योंकि गड़बड़ियों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। फुलजले ने बातचीत में यह जरूर कहा कि हमने एसडीओ को जांच के निर्देश दिए हैं। सूत्रों का कहना है कि सीईओ ने जांच की आड़ में केवल एसडीओ और प्रभारी एसडीओ एवं रेंजर सुनीता अहिरवार के बीच काम का बंटवारा कर दिया। लेकिन वित्तीय अधिकार महिला रेंजर अहिरवार के पास ही निहित है। यानी खरीदी में हुई गड़बड़ियों की जांच पर लीपा पोती के लिए अहिरवार से वित्तीय अधिकार नहीं लिया गया। इसके पीछे संघ में चर्चा है कि मंत्रालय में पदस्थ एक शीर्षस्थ अधिकारी की सिफारिश से ही केंद्र में रेंजर को एसडीओ का प्रभारी बनाया गया और वित्तीय अधिकार दिए गए हैं।
इनका कहना
एपीसीसीएफ के पत्र को संज्ञान में लिया है और जांच के लिए एसडीओ को निर्देश दिए हैं।
पीजी फूलजले, सीईओ प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केंद्र बरखेड़ा पठानी

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