23 बच्चों की मौत का दावा, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने बालाघाट कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग से मांगा जवाब.
Claim of 23 Child Deaths: National Commission for Scheduled Tribes Seeks Response from Balaghat Collector and Health Department.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। बालाघाट जिले के दक्षिण बैहर क्षेत्र में बच्चों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बिरसा विकासखंड के आदिवासी एवं बैगा बहुल दूरस्थ गांवों में लगातार सामने आ रही बच्चों की मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था, समय पर उपचार की उपलब्धता और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
18 अगस्त को अडोरी पंचायत के उसकाल गांव में 3 वर्षीय आकाश धुर्वे पिता बिशन सिंह धुर्वे की मौत होने की जानकारी सामने आई है। इस नई मौत के बाद क्षेत्र में बच्चों की मौत का आंकड़ा 23 तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है।
आकाश को पहले जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बताया गया कि उसकी हालत में सुधार होने के बाद उसे वापस घर भेज दिया गया था। इसके बाद उसकी मौत किन चिकित्सकीय परिस्थितियों में हुई, यह स्पष्ट करने के लिए उसके उपचार संबंधी रिकॉर्ड और मृत्यु के कारण की आधिकारिक जांच बेहद जरूरी है।
23 मौतों के बीच मलेरिया और मीजल्स की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
बैगा बहुल क्षेत्रों में बच्चों की मौतों को लेकर की गई जांच में मलेरिया और मीजल्स (खसरा) संक्रमण की जानकारी सामने आने की बात कही जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ICMR और NIV, पुणे से जुड़ी जांच में मीजल्स संक्रमण की पुष्टि होने की जानकारी सामने आई है।
यदि इन संक्रमणों की पुष्टि हुई है, तो प्रभावित गांवों में केवल सामान्य उपचार पर्याप्त नहीं होगा। संक्रमण की वास्तविक स्थिति जानने के लिए गांववार स्क्रीनिंग, संपर्क में आए लोगों की पहचान, टीकाकरण की स्थिति की समीक्षा और गंभीर मरीजों की निगरानी आवश्यक हो जाती है।
स्वास्थ्य विभाग अब अलर्ट मोड पर है। विभाग की ओर से पांच सदस्यीय दल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्थिति का जायजा ले रहा है।
वहीं, घर-घर किए गए सर्वे में अब तक 3,071 लोगों की जांच किए जाने और इनमें से 657 लोगों के विभिन्न बीमारियों से ग्रसित पाए जाने की जानकारी दी गई है। इन मरीजों का उपचार किए जाने का दावा किया गया है।
लेकिन यहां सवाल यह है कि यदि सर्वे में इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमार पाए जा रहे हैं, तो क्या यह क्षेत्र में स्वास्थ्य संकट की गंभीरता का संकेत नहीं है?
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक पहुंचा मामला
बैगा जनजाति के बच्चों की मौत और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का मामला अब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) तक पहुंच गया है।
जानकारी के अनुसार वनवासी विकास परिषद महाकौशल प्रांत के लखन मरावी ने आयोग को लिखित शिकायत भेजकर बच्चों की मौत के कारणों की जांच तथा कथित लापरवाही के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की है।
मामले का संज्ञान लेते हुए आयोग द्वारा मध्यप्रदेश शासन के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव और बालाघाट कलेक्टर को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला अब केवल स्थानीय प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रीय स्तर की संवैधानिक संस्था के समक्ष शिकायत पहुंचने के बाद प्रशासन के सामने तथ्यों, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रत्येक मृत्यु के कारणों को रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट करने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
दुर्गम गांव, दूर स्वास्थ्य केंद्र और इलाज में देरी—क्या यही सबसे बड़ा संकट?
बालाघाट जिले के बैहर और बिरसा विकासखंड के कई दूरस्थ बैगा बहुल गांव भौगोलिक रूप से कठिन क्षेत्रों में स्थित हैं। ग्रामीणों को स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने में लंबी दूरी और परिवहन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
यही स्थिति बीमारी को गंभीर होने से पहले उपचार मिलने की राह में बड़ी बाधा बन सकती है। विशेष रूप से छोटे बच्चों में बुखार, संक्रमण, कुपोषण या अन्य गंभीर लक्षणों की स्थिति में समय पर पहचान और तत्काल रेफरल बेहद महत्वपूर्ण होता है।
लेकिन 23 बच्चों की मौत के दावे और सैकड़ों लोगों के बीमार पाए जाने की जानकारी के बीच अब प्रशासन से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने जरूरी हैं—
क्या प्रत्येक बच्चे की मौत का मेडिकल ऑडिट हुआ?
क्या सभी प्रभावित गांवों में टीकाकरण की स्थिति का सत्यापन किया गया?
क्या मलेरिया और मीजल्स की रोकथाम के लिए गांववार कार्ययोजना बनाई गई?
क्या दुर्गम गांवों के लिए मोबाइल मेडिकल टीम और आपातकालीन परिवहन पर्याप्त है?
और सबसे महत्वपूर्ण—अगर बीमारी की पहचान हो चुकी थी, तो मौतों को रोकने के लिए समय रहते क्या कदम उठाए गए?
अब जरूरत आंकड़े गिनने की नहीं, बल्कि हर मौत के कारण की वैज्ञानिक जांच, प्रभावित परिवारों की सहायता और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों को दूर करने की है।
दक्षिण बैहर की यह स्थिति प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि दुर्गम आदिवासी गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं नियमित और समय पर नहीं पहुंचीं, तो बीमारी और मौत का यह संकट दोबारा भी गहरा सकता है।
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