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चावल की खुशबू ने बढ़ाई चिंता, नागरिक मंच के खुलासे से हड़कंप.

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Rice Aroma Raises Concerns, Consumer Forum’s Revelation Triggers Uproar.

Special Correspondent, Jabalpur, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, जबलपुर/बालाघाट। मध्य प्रदेश में कृत्रिम रूप से सुगंधित बनाए जा रहे चावल को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच द्वारा जारी दस्तावेज ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि बालाघाट की राइस मिलों में केमिकल मिलाकर तैयार किया गया चावल जबलपुर समेत प्रदेश के कई जिलों में बेचा जा रहा है।

यह मामला सामने आने के बाद खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, जांच प्रक्रिया और बाजार में बिक रहे चावल की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है।

बालाघाट की राइस मिलों में मिला “सुगंध का केमिकल”?

जारी दस्तावेज के मुताबिक मार्च महीने में कलेक्टर बालाघाट के निर्देश पर कई राइस मिलों में औचक निरीक्षण किया गया था। जांच के दौरान कथित तौर पर ऐसे केमिकल मिले, जिनका इस्तेमाल साधारण चावल को “सुगंधित” बनाने के लिए किया जा रहा था।

जांच टीम ने “काली मूंछ” नामक सुगंधित चावल और एसेंस के नमूने भी लिए। साथ ही फ्लेवर से संबंधित बोरी और सामग्री को जब्त कर कार्रवाई की गई। नमूनों को जांच के लिए भोपाल स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला भेजा गया है।

जबलपुर समेत कई जिलों में सप्लाई का दावा

नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने दावा किया है कि बालाघाट से यह कृत्रिम रूप से सुगंधित चावल प्रदेश के कई जिलों में सप्लाई किया जा रहा है। मंच ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

दस्तावेज में खाद्य सुरक्षा आयुक्त और कलेक्टरों को पत्र भेजकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।

“परमिसिबल एसेंस” या सेहत से खिलवाड़?

दस्तावेज में “परमिसिबल एसेंस” का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि खाद्य सुरक्षा नियम 2011 में खाद्य पदार्थों में सीमित मात्रा में फ्लेवर उपयोग की अनुमति है। लेकिन आरोप है कि निर्धारित मात्रा और मानकों से अधिक उपयोग स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बाजार में बिक रहा सुगंधित चावल वास्तव में प्राकृतिक है या फिर केमिकल के जरिए उसकी खुशबू तैयार की जा रही है?

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

पूरे मामले में अब सभी की नजरें राज्य खाद्य प्रयोगशाला की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह प्रदेश के खाद्य कारोबार से जुड़ा बड़ा मामला साबित हो सकता है।

बड़ा सवाल

क्या उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंच रहा है “केमिकल वाला चावल”? और अगर जांच चल रही थी तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

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