8 रुपये में बच्चों का भविष्य? आंगनबाड़ी में पोषण नहीं, सिर्फ दिखावा.
Children’s future for just ₹8? No real nutrition in Anganwadis, only a show.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, भोपाल — मध्य प्रदेश में कुपोषण खत्म करने के दावे जितने ऊंचे हैं, ज़मीनी हकीकत उतनी ही कड़वी है। राज्य की आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को मिलने वाले पूरक पोषण आहार (SNP) की दरें पिछले आठ वर्षों से नहीं बढ़ीं।
आज भी सामान्य बच्चों के लिए प्रतिदिन सिर्फ 8 रुपये और अति गंभीर कुपोषित बच्चों के लिए मात्र 12 रुपये तय हैं।
सवाल साफ है—
महंगाई के इस दौर में क्या 8 रुपये में पोषण संभव है, या यह सिर्फ फाइलों में चलने वाली योजना बनकर रह गई है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक प्रदेश में—
- 35.7% बच्चे ठिगनेपन (Stunting) के शिकार हैं
- 33% बच्चे कम वजन (Underweight) की स्थिति में हैं
- 19% बच्चे दुबलापन (Wasting) झेल रहे हैं
हाल के पोषण ट्रैकर और सरकारी आंकड़ों में कुछ सुधार जरूर दिखाया जा रहा है, लेकिन आदिवासी बहुल जिलों में हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं।
विधानसभा में सवाल, सरकार ने साफ इंकार
चुरहट विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक
अजय सिंह
ने विधानसभा में सीधा सवाल उठाया कि जब महंगाई कई गुना बढ़ चुकी है, तो पिछले दस वर्षों में आंगनबाड़ी के पोषण आहार की दर क्यों नहीं बढ़ाई गई?
क्या सरकार इसे कम से कम दोगुना करने पर विचार करेगी?
इस पर महिला एवं बाल विकास मंत्री
निर्मला भूरिया
ने लिखित जवाब में साफ कह दिया—
“पूरक पोषण आहार की दर भारत सरकार द्वारा तय की जाती है। वर्ष 2017 में आखिरी बार इसमें वृद्धि हुई थी। राज्य स्तर पर दर बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।”
यानी साफ संदेश—
बच्चों के पोषण के लिए राज्य सरकार के पास न इच्छा है, न कोई ठोस पहल।
8 रुपये बच्चे पर, 40 रुपये गाय पर?
विपक्ष का आरोप है कि 8 रुपये में आज मुश्किल से एक मुट्ठी दाल-चावल या थोड़ा सा दूध ही आ सकता है, जबकि सरकारी स्तर पर गौशालाओं में एक गाय के चारे पर औसतन 40 रुपये प्रतिदिन तक खर्च किए जा रहे हैं।
यह तुलना सरकार की प्राथमिकताओं पर सीधा सवाल खड़ा करती है।
आंकड़ों में सुधार, लेकिन रफ्तार बेहद धीमी
NFHS-4 की तुलना में प्रदेश में—
- ठिगनेपन में 1.6% की कमी
- कम वजन में 2.3% की कमी
- दुबलेपन में 2.6% की कमी
दिखाई गई है, लेकिन इसके बावजूद मध्य प्रदेश अब भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है।
योजनाएं बहुत, बजट वही पुराना
Poshan Abhiyaan और Saksham Anganwadi & Poshan 2.0 जैसी योजनाओं के जरिए डाइट डाइवर्सिटी, प्रोटीन और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पर फोकस की बात की जा रही है।
प्रदेश सरकार 2030 तक कुपोषण मुक्त राज्य का लक्ष्य दोहरा रही है।
हाल ही में मुख्यमंत्री
मोहन यादव
ने तीन साल में कुपोषण खत्म करने की “फुल-प्रूफ योजना” बनाने के निर्देश भी दिए हैं।
लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि
जब तक थाली की कीमत नहीं बढ़ेगी, तब तक घोषणा से कुपोषण नहीं मिटेगा।
दरें बढ़ाने की बात, लेकिन मध्य प्रदेश में अमल नहीं
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, 2024 में केंद्र स्तर पर सामान्य बच्चों के लिए दर 18 रुपये तक करने पर चर्चा हुई थी, लेकिन मध्य प्रदेश में आज भी वही पुरानी दरें लागू हैं।
कांग्रेस नेता
हेमंत कटारे
का कहना है—
“बच्चों पर 8-12 रुपये और गायों पर 40 रुपये—यही सरकार की असली प्राथमिकता है। कुपोषण सिर्फ भोजन की नहीं, गरीबी, शिक्षा और स्वच्छता से जुड़ी समस्या है।”
हकीकत यह है…
कुपोषण खत्म करने के लिए सिर्फ पोस्टर और योजनाएं नहीं, बल्कि—
- पर्याप्त बजट
- दरों में वास्तविक बढ़ोतरी
- बेहतर निगरानी
- स्थानीय स्तर पर जवाबदेही
ज़रूरी है।
आठ रुपये में कुपोषण नहीं मिटता —
मिटता है तो सिर्फ सरकार का दावा, और बच्चों का भविष्य।