नल में पानी या बीमारी का खतरा? रेलवे स्टेशनों पर CAG का बड़ा खुलासा.
Water from the Tap or a Health Risk? CAG’s Major Revelation on Drinking Water at Railway Stations.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, भोपाल। रेलवे स्टेशन पर मुफ्त पानी मिलना यात्रियों की बुनियादी सुविधा है, लेकिन अगर उसी पानी में बैक्टीरिया मिलने लगे तो सवाल सिर्फ सुविधा का नहीं, यात्रियों की सेहत और रेलवे की जवाबदेही का बन जाता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने भारतीय रेलवे के कई स्टेशनों पर पेयजल व्यवस्था की गुणवत्ता और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
ऑडिट में कुछ स्टेशनों के वाटर कूलर और प्लेटफॉर्म नलों के पानी के नमूनों में E. coli और कुल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए जाने की जानकारी सामने आई है। CAG के निष्कर्षों ने यह सवाल खड़ा किया है कि करोड़ों यात्रियों को रोजाना पानी उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था में नियमित जांच और रखरखाव कितना प्रभावी है।
512 स्टेशनों का ऑडिट, 458 में सुविधाएं मानकों से कम
CAG ने 512 नॉन-सबअर्बन रेलवे स्टेशनों का ऑडिट किया। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें 458 स्टेशन यानी करीब 89 प्रतिशत ऐसे पाए गए जहां न्यूनतम आवश्यक सुविधाएं (Minimum Essential Amenities—MEA) अधूरी थीं या निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थीं।
पेयजल की जांच को लेकर भी स्थिति चिंताजनक रही। ऑडिट के दौरान आठ स्टेशनों के वाटर कूलर के नमूनों में E. coli पाया गया। इनमें कोयंबटूर और पालक्काड़ जंक्शन, हैदराबाद, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, भिवंडी रोड, कल्याण, लोनावला और मधुपुर शामिल बताए गए हैं।
इसके अलावा प्लेटफॉर्म नलों से लिए गए नमूनों में 2022-23 के दौरान 49 स्टेशनों और 2023-24 में 56 स्टेशनों पर कुल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 59 स्टेशनों पर बैक्टीरियोलॉजिकल टेस्टिंग ही नहीं की गई। कई स्थानों पर पानी में क्लोरीन का स्तर भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।
मुफ्त पानी की सुविधा ही बन जाए बीमारी का खतरा?
रेलवे यात्रियों के लिए पेयजल कोई विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यक सुविधा है। खासकर जनरल और स्लीपर क्लास में सफर करने वाले यात्रियों का एक बड़ा वर्ग स्टेशन पर उपलब्ध मुफ्त पानी पर निर्भर रहता है।
ऐसे में यदि किसी वाटर कूलर या नल के पानी में फीकल-कॉलिफॉर्म अथवा E. coli जैसे संकेतक बैक्टीरिया पाए जाते हैं, तो जल स्रोत, पाइपलाइन, टंकी, सफाई व्यवस्था और रखरखाव की पूरी श्रृंखला पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
E. coli की मौजूदगी आमतौर पर फीकल संदूषण की ओर संकेत कर सकती है और दूषित पानी से डायरिया, टाइफाइड तथा अन्य जलजनित संक्रमणों का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, किसी विशेष नमूने से बीमारी होने का निष्कर्ष अलग से चिकित्सकीय और epidemiological जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
रेलवे के अपने मानकों में भी यात्रियों की संख्या के अनुरूप स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना आवश्यक माना गया है। ऐसे में सवाल यह है कि नियम मौजूद होने के बावजूद उनकी नियमित निगरानी और अनुपालन में कमी क्यों दिखाई दी?
‘Tank to Tap’ योजना से बदलेगी तस्वीर या फिर रह जाएगी घोषणा?
CAG की रिपोर्ट के बाद रेलवे की ओर से पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ‘Tank to Tap’ पहल के तहत लगभग 20,000 स्थानों पर फिल्ट्रेशन और मॉनिटरिंग सिस्टम लगाने, पानी की टंकियों को बदलने तथा स्रोत और आउटलेट दोनों स्तरों पर नियमित जांच की व्यवस्था की बात सामने आई है।
लेकिन अब असली परीक्षा घोषणा की नहीं, जमीनी अमल और निरंतर निगरानी की है।
क्या हर स्टेशन पर पानी की नियमित स्वतंत्र जांच होगी?
क्या खराब नमूने मिलने पर तत्काल वाटर कूलर या नल को बंद किया जाएगा?
क्या टंकियों और पाइपलाइनों की सफाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाएगा?
और सबसे अहम—लापरवाही मिलने पर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
रेलवे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है। इसलिए पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा में ‘टेस्टिंग नहीं हुई’ जैसी स्थिति को सामान्य प्रशासनिक कमी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
CAG की रिपोर्ट ने एक बड़ा आईना सामने रखा है। अब देखना यह है कि रेलवे इस आईने में दिख रही कमियों को दूर करता है या ‘Tank to Tap’ भी कागजी योजना बनकर रह जाती है।
MP संवाद समाचार का सवाल: जब यात्रियों से सुविधा के नाम पर व्यवस्था की अपेक्षा की जाती है, तो क्या उन्हें मिलने वाला मुफ्त पानी भी नियमित जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही की गारंटी के साथ नहीं मिलना चाहिए?
Legal Disclaimer
This report summarizes audit findings and public concerns; it does not establish individual wrongdoing or medical causation without competent investigation and evidence.