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मिट्टी से निकले शब्द, साहित्य में गूंज रही पचेली की आवाज.

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Words Born from the Soil, the Voice of Pacheli Echoes Through Literature.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, कटनी। कटनी और जबलपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में बोली जाने वाली पचेली बोली अब अपनी अलग साहित्यिक पहचान बनाने की ओर तेजी से बढ़ रही है। बघेलखंड, बुंदेलखंड और गोंडवाना की सांस्कृतिक परंपराओं के संगम से विकसित इस बोली को भाषा विशेषज्ञ एक विशिष्ट लोकभाषा के रूप में देखते हैं।

पांच बोलियों के मिश्रण से विकसित पचेली बोली सदियों से जनजीवन में प्रचलित रही है, लेकिन लंबे समय तक इसका साहित्य पुस्तकाकार रूप में उपलब्ध नहीं था। पिछले एक दशक में साहित्यकारों और संस्कृति प्रेमियों के प्रयासों से इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं।

साहित्यकारों के प्रयासों से मिली नई उड़ान

पचेली बोली के संवर्धन में साहित्यकार डॉ. कौशल दुबे, शरद अग्रवाल और अन्य रचनाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2017 में प्रकाशित पुस्तक ‘पचेली साहित्य एवं संस्कृति’ ने क्षेत्रीय लेखकों को इस बोली में लेखन के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद पचेली काव्य संकलनों का प्रकाशन शुरू हुआ और कई नए रचनाकार इस साहित्यिक आंदोलन से जुड़े।

पचेली काव्य वीथिका बनी सांस्कृतिक दस्तावेज

हाल ही में प्रकाशित ‘पचेली काव्य वीथिका’ में 29 रचनाकारों की कविताओं को स्थान दिया गया है। इस संकलन में ग्रामीण जीवन, कृषि संस्कृति, लोक परंपराएं, सामाजिक बदलाव, हास्य-व्यंग्य और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है।

रचनाओं में जहां पचेल अंचल की मिट्टी की सुगंध है, वहीं आधुनिक समय की चुनौतियों और सामाजिक परिवर्तनों का भी प्रभाव दिखाई देता है।

किसानों, गांव और लोकजीवन की झलक

संकलन में शामिल कविताएं किसानों की समस्याओं, ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों, सामाजिक विषमताओं और बदलते समय की तस्वीर को लोकभाषा के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

रचनाकारों ने कृषि संकट, गांवों के बदलते स्वरूप, सामाजिक रिश्तों और लोक संस्कृति को अपनी कविताओं का प्रमुख विषय बनाया है।

तैयार हो रहा पचेली शब्दकोश

पचेली भाषा को संरक्षित करने के लिए केवल कविता और साहित्य ही नहीं, बल्कि शब्दकोश निर्माण का कार्य भी जारी है। डॉ. सुरेंद्र सिंह बागरी के संयोजन में पचेली शब्दकोश तैयार किया जा रहा है, जो इस बोली के संरक्षण में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

इसके अलावा पचेली नवगीत, गद्य संकलन और अन्य साहित्यिक कृतियां भी प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं।

मध्यप्रदेश की पांचवीं प्रमुख बोली बनने की उम्मीद

वरिष्ठ साहित्यकार और पद्मश्री सम्मानित साहित्यकार बाबूलाल दाहिया ने पचेली बोली को मध्य भारत की विशिष्ट लोकभाषा बताते हुए इसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।

साहित्यकारों का मानना है कि यदि इसी तरह लेखन और शोध कार्य जारी रहे तो आने वाले समय में पचेली बोली को मध्यप्रदेश की प्रमुख बोलियों में सम्मानजनक स्थान मिल सकता है।

लोकभाषा से साहित्य तक का सफर

पचेली बोली का पुस्तकाकार साहित्य के रूप में सामने आना केवल भाषा का विकास नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक स्मृतियों के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषाई विरासत से जोड़ने का कार्य करेगा।

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