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पत्रकारिता बिकेगी या टिकेगी? विज्ञापन का खेल, पत्रकारिता पर वार.

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Will journalism be sold or survive? The game of advertisements strikes at the heart of journalism.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद, नई दिल्ली/ भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी विज्ञापन वितरण को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या यह सिस्टम पारदर्शी है या “अनुकूलता” का खेल बन चुका है?

जनसंपर्क विभाग की प्रक्रिया कागजों पर भले ही लंबी और व्यवस्थित दिखे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। जहां एक ओर छोटे और निष्पक्ष मीडिया संस्थान वर्षों तक फाइलों के चक्कर काटते रहते हैं, वहीं कुछ “चुनिंदा” संस्थानों को चंद घंटों में मंजूरी मिल जाती है।

यही वह बिंदु है जहां सवाल खड़ा होता है—
👉 क्या योग्यता अब मायने नहीं रखती?
👉 क्या सर्कुलेशन और दर्शक संख्या सिर्फ दिखावे के लिए हैं?

केंद्र की Central Bureau of Communication व्यवस्था पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन राज्य स्तर पर चयनात्मक क्रियान्वयन इस पूरी प्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

Press Council of India के मानकों के बावजूद, जब विज्ञापन “इनाम” और “सजा” का माध्यम बन जाते हैं, तो पत्रकारिता की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है।

सबसे बड़ा नुकसान किसका?
👉 जनता का…
क्योंकि निष्पक्ष मीडिया कमजोर होगा, तो सच भी कमजोर होगा।

आज स्थिति यह है कि
👉 जो सवाल पूछता है, वह इंतजार करता है
👉 जो समझौता करता है, वह आगे बढ़ता है

अब वक्त आ गया है कि इस सिस्टम पर गंभीर पुनर्विचार हो—
👉 क्या विज्ञापन योग्यता से मिलेंगे या “अनुकूलता” से?

भोपाल से उठी यह बहस अब पूरे सिस्टम की सच्चाई उजागर कर रही है।

यह सिर्फ फाइलों का खेल नहीं…
यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता का सवाल है।

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