हादसा या हत्या? – एमवाय अस्पताल में मासूमों की जान ले गया सिस्टम.
Accident or Murder? – System Snatched Infants’ Lives in MY Hospital.
Special Correspondent, Indore, MP Samwad.
The tragic death of two newborns in Indore’s MY Hospital exposes the brutal face of the healthcare system. Rats biting infants inside the NICU is not just negligence but a horrifying reminder of systemic failure. Despite government action, the core question remains—will future lives be saved or lost again?
MP संवाद, खंडवा की लक्ष्मी और देवास की रेहाना ने अपने बच्चों को जन्म तो दिया, लेकिन इंदौर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवाय में चूहों ने उन मासूमों को कुतर डाला। मंगलवार को एक बच्चा और बुधवार को दूसरा बच्चा मौत की नींद सो गया। यह सिर्फ मौत नहीं, हमारे सिस्टम का सबसे निर्मम चेहरा है।
अस्पताल का बचाव, पर सवाल बरकरार
अस्पताल अधीक्षक अशोक यादव का कहना है कि दोनों नवजात गंभीर बीमारी और कमज़ोरी के साथ भर्ती हुए थे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर मौत बीमारी से भी हुई, तो क्या NICU में चूहों का पहुंच जाना अपराध नहीं है? अस्पताल में चूहे का होना मौत जितना ही भयावह है।
पहली बार नहीं, मौतों की लंबी सूची
यह घटना नई नहीं है। 2023 में भोपाल के हमीदिया अस्पताल में शव का कान चूहों ने कुतरा था। विदिशा में शव का हाथ और नाक, सागर में आंखें तक चूहों ने नोच डाली थीं। अब इंदौर का एमवाय अस्पताल भी उसी लापरवाही का गवाह बन गया है।
बरसात बहाना, असलियत और कड़वी
अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि बरसात में झाड़ियां और बिलों में पानी भरने से चूहे बाहर आ गए। लेकिन हकीकत यह है कि अस्पताल कैंपस में मरीजों के अटेंडरों का खाना और कचरा चूहों के लिए मुफ्त की दावत है। यही कारण है कि कैंसर अस्पताल, बाल चिकित्सालय, टीबी सेंटर तक चूहों का आतंक फैला है।
कागज़ पर कार्रवाई, हकीकत जस की तस
सरकार ने तात्कालिक कार्रवाई करते हुए पेस्ट कंट्रोल एजेंसी पर जुर्माना, नर्सिंग सुपरीटेंडेंट को हटाना, दो नर्सिंग ऑफिसरों को निलंबित करना और HOD को नोटिस थमाना बताया। लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ़ दिखावटी कदम हैं। हर हादसे के बाद वही स्क्रिप्ट दोहराई जाती है – हादसा, हड़कंप, नोटिस और फिर भूल।
सवाल अभी भी जिंदा है
कौन देगा हिसाब उन मांओं का जिनकी गोद हमेशा के लिए सूनी हो गई? क्या यह व्यवस्था इतनी बेजान हो चुकी है कि इंसान की जान अब सिर्फ़ आंकड़ों में गिनी जाती है? यह हादसा नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र की वह स्याह सच्चाई है, जहां इलाज की उम्मीद लेकर आने वाला कभी कफन में, तो कभी झूठे दिलासों में लौटता है।