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सरकारी बंगला कोई विरासत नहीं—अपात्रों पर कार्रवाई शुरू.

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Action against ineligible leaders and IAS officers occupying government bungalows in Madhya Pradesh

Madhya Pradesh government issues eviction notices to ineligible leaders and IAS officers occupying government bungalows.

Government bungalows are not inheritance — action begins against ineligible occupants.

Special Correspondent, Richa Tiwari, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद, भोपाल। सत्ता बदलते ही कुर्सी छोड़ने की परंपरा तो है, लेकिन मध्य प्रदेश में सरकारी बंगलों को छोड़ने की परंपरा मानो नेताओं और अफसरों के लिए लागू ही नहीं होती। अब डॉ. मोहन यादव सरकार ने इसी ‘विशेषाधिकार मानसिकता’ पर सीधा प्रहार किया है।

भाजपा सरकार ने पहली बार अपने ही नेताओं, पूर्व मंत्रियों और आईएएस अधिकारियों को सरकारी बंगलों से बाहर करने का साहसिक फैसला लिया है। गृह विभाग ने साफ कर दिया है— पात्रता नहीं, तो बंगला नहीं।

पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्व. प्रभात झा के निधन को डेढ़ साल बीत चुका है, लेकिन सरकारी बंगला अब भी परिवार के कब्जे में है। वहीं 2023 का चुनाव हार चुके पूर्व मंत्री रामपाल दो साल से सरकारी छत का सुख भोग रहे हैं।

हार गए चुनाव, फिर भी राजसी ठाठ

पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, पूर्व सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया जैसे कई दिग्गज चुनाव हारने के बाद भी सरकारी आवासों से चिपके हुए हैं। सवाल यह है— जब जनता ने नकार दिया, तो सरकारी सुविधा किस अधिकार से?

महिला नेता भी ‘विशेष छूट’ की कतार में

पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया भी पात्रता खत्म होने के बावजूद सरकारी बंगलों में रह रही हैं। नियम आम जनता के लिए और रसूखदारों के लिए अलग— यही तो सिस्टम की सबसे बड़ी बीमारी है।

IAS अफसर भी घेरे में

केवल नेता ही नहीं, चार IAS अधिकारी भी सरकारी बंगलों को निजी संपत्ति समझ बैठे। संपदा संचालनालय ने साफ कर दिया है— अब नाम नहीं, नियम चलेगा।

अब नहीं खाली किया तो 30 गुना किराया

मोहन सरकार ने साफ संदेश दे दिया है—
तीन महीने बाद 10 गुना किराया, फिर 30 गुना जुर्माना और जरूरत पड़ी तो बलपूर्वक बेदखली।

यह कार्रवाई सिर्फ बंगलों की नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार पर भी चोट है। अब देखना यह है कि क्या यह सख्ती जमीन पर उतरेगी या फिर फाइलों में ही दम तोड़ देगी।

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