ई-उपार्जन बना ई-उत्पीड़न! ढीमरखेड़ा में किसान परेशान.
E-Procurement Turns into E-Harassment: Farmers Struggle in Dheemarkheda.

Special Correspondent, Katni, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार | कटनी
किसानों की उपज को समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए शुरू की गई ई-उपार्जन व्यवस्था अब ढीमरखेड़ा क्षेत्र में किसानों के लिए राहत नहीं, बल्कि परेशानी का कारण बन गई है।
सरकारी दावे भले ही मजबूत हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अन्नदाता अपनी ही फसल बेचने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।
स्लॉट बुकिंग सिस्टम ध्वस्त, सर्वर बना सबसे बड़ी बाधा
क्षेत्र के उपार्जन केंद्रों पर स्लॉट बुकिंग की व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है।
- किसान सुबह से शाम तक लाइन में खड़े
- नंबर आते ही “सर्वर डाउन” का बहाना
- कई दिनों से लगातार प्रयास के बावजूद बुकिंग नहीं
नतीजा—किसानों में भारी आक्रोश और निराशा
स्लॉट मिला तो भी राहत नहीं, तुलाई के लिए दिनों का इंतजार
जिन किसानों को किसी तरह स्लॉट मिल भी जाता है, उनकी मुश्किलें खत्म नहीं होतीं।
- केंद्रों पर तुलाई में कई-कई दिनों की देरी
- अव्यवस्थित प्रबंधन, कोई स्पष्ट सूचना नहीं
- किसान ट्रैक्टर-ट्रॉली और अनाज के साथ खुले में डेरा डालने को मजबूर
सवाल—क्या यही है किसानों के लिए डिजिटल सुविधा?
रीठी में अलग संकट: लेबर नहीं, ऊपर से ‘शुल्क’ का दबाव
रीठी क्षेत्र के किसानों ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं:
- समय पर मजदूर उपलब्ध नहीं
- किसान खुद मजदूर लेकर काम कराने को मजबूर
- तुलाई के नाम पर जगह-जगह वसूली
कई केंद्रों पर नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
प्रशासन खामोश, किसान परेशान—जिम्मेदार कौन?
पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है।
किसान लगातार मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन
न तो व्यवस्था सुधर रही है और न ही जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो रही है।
‘डिजिटल सिस्टम’ या ‘डिजिटल संकट’?
ई-उपार्जन जैसी योजना, जो किसानों के लिए सहूलियत बननी चाहिए थी, आज तकनीकी खामियों और कुप्रबंधन का शिकार बन गई है।
यह स्थिति न केवल किसानों की मेहनत पर पानी फेर रही है, बल्कि सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रही है।
कब मिलेगी राहत?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या प्रशासन इस अव्यवस्था को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएगा, या किसान यूं ही सिस्टम की मार झेलते रहेंगे?