बीमार बच्चे, कम पड़ते बेड और भटकते परिजन! लांजी में स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल?
Sick Children, Shortage of Beds and Stranded Families! Has Lanji’s Healthcare System Been Exposed?

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल लांजी क्षेत्र में स्वास्थ्य संकट को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। संक्रमण और बीमारियों से निपटने के लिए शासन-प्रशासन की ओर से स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन लांजी सिविल अस्पताल की जमीनी तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
अस्पताल में प्रतिदिन करीब 20 से 25 मरीज पहुंचने की जानकारी सामने आई है। मरीजों की बढ़ती संख्या के बीच आदिवासी बैगा परिवारों को पर्याप्त बेड उपलब्ध नहीं होने की शिकायत है। स्थिति यह बताई जा रही है कि एक ही बेड पर दो से तीन बच्चों को लिटाकर उपचार करना पड़ रहा है। यदि यह स्थिति लगातार बनी हुई है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि संक्रमण प्रभावित क्षेत्रों के लिए अस्पतालों में अतिरिक्त बेड और चिकित्सा संसाधनों की व्यवस्था समय रहते क्यों नहीं की गई?
लांजी में स्वास्थ्य संकट: 30 गांवों से पहुंच रहे मरीज
जानकारी के अनुसार बिरसा क्षेत्र के करीब 30 गांवों से बीमार मरीज उपचार के लिए लांजी पहुंच रहे हैं। इनमें मलेरिया, मीजल्स, कुपोषण, पीलिया और तेज बुखार जैसे लक्षणों से पीड़ित मरीज शामिल बताए जा रहे हैं।
लांजी सिविल अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ उपचार के बाद उन्हें वापस गांव पहुंचाने की व्यवस्था भी चर्चा में है। आरोप है कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद कुछ मरीजों और उनके परिजनों को घर लौटने के लिए एम्बुलेंस सुविधा के लिए भटकना पड़ रहा है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि प्रभावित क्षेत्रों से मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था सक्रिय है, तो उपचार के बाद उन्हें सुरक्षित उनके गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था पर्याप्त क्यों नहीं है?
अस्पताल से छुट्टी के बाद बस स्टैंड पर भटकता आदिवासी परिवार
बुधवार को स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी एक मार्मिक तस्वीर सामने आई। बताया गया कि एक आदिवासी परिवार अपने बच्चों के उपचार के लिए अस्पताल आया था। इसी दौरान परिवार की एक महिला की मृत्यु हो गई। अस्पताल से छुट्टी के बाद परिवार को अपने गांव लौटना था, लेकिन तत्काल परिवहन सुविधा नहीं मिल सकी।
परिवार काफी देर तक बस स्टैंड पर भटकता रहा। बाद में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने उन्हें उनके गांव तक पहुंचाने में मदद की।
यह घटना केवल एक परिवार की परेशानी तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करती है कि दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों से आने वाले गरीब परिवारों के लिए अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद सुरक्षित घर वापसी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
करोड़ों के बजट के बीच एक बेड पर तीन बच्चे—कागज भारी या स्वास्थ्य व्यवस्था?
मुख्यमंत्री के दौरे के बाद संक्रमण प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने की घोषणा की गई थी। इसके बावजूद लांजी अस्पताल की सामने आई तस्वीरें यह सवाल पूछ रही हैं कि घोषणाओं और जमीनी क्रियान्वयन के बीच कितना अंतर है।
बैगा समुदाय के लिए विशेष योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर सरकारी बजट उपलब्ध होने के बावजूद यदि बच्चों को एक ही बेड पर उपचार लेना पड़ रहा है, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
पिछले कुछ समय से प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं सामने आती रही हैं। ऐसे में मरीजों की वास्तविक संख्या, बीमारियों के कारण, उपलब्ध बेड, दवाओं, डॉक्टरों और एम्बुलेंस की स्थिति को लेकर पारदर्शी और नियमित आंकड़े सार्वजनिक किए जाना जरूरी है।
तस्वीरें सवाल जरूर पूछती हैं, लेकिन जवाब आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाली व्यवस्था से ही मिलेगा। अब जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि प्रभावित गांवों में मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं, पर्याप्त बेड, दवाएं, चिकित्सा स्टाफ और मरीजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की है।
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