जनवरी में संकेत, अब 22 मौतें! बालाघाट में RBSK पर बड़ा सवाल.
Signs in January, 22 Deaths Now! Big Questions Over RBSK in Balaghat.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल।. बालाघाट। बिरसा क्षेत्र में बैगा आदिवासी बच्चों की मौतों के बाद अब केवल बीमारी के अंतिम कारणों पर ही नहीं, बल्कि बीमारी के शुरुआती संकेतों के बाद स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। MP संवाद समाचार को मिली जानकारी के अनुसार एक सामाजिक संस्था डॉ केशव राय हेडगेवार ट्रस्ट द्वारा 30 दिसंबर 2025 को प्रभावित क्षेत्रों में जांच शिविर का आयोजन किया था. संस्था ने करीब 300 लोगों की जांच की जिनमें बच्चों में त्वचा रोग और उससे जुड़े लक्षण सामने आने की सूचना संस्था के अधिकारियों द्वारा तत्कालीन कलेक्टर मृणाल मीणा तक पहुंची थी, तत्कालीन कलेक्टर मृणाल मीणा ने इस पर संस्था को आश्वासन दिया था इस पर तो सवाल है कि इसके बाद राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम यानी RBSK की टीमों ने क्या कार्रवाई की?
क्या प्रभावित बच्चों की दोबारा स्क्रीनिंग हुई? क्या गंभीर या संदिग्ध बच्चों को उपचार और रेफरल की सुविधा मिली? क्या जिला स्तर पर इसकी समीक्षा हुई? इन सवालों के जवाब अब पूरे मामले की जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
जनवरी में संकेत मिले, फिर भी क्यों नहीं चेता स्वास्थ्य तंत्र?
RBSK का उद्देश्य जन्म से 18 वर्ष तक के बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शीघ्र पहचान, उपचार, रेफरल और फॉलोअप सुनिश्चित करना है। ऐसे में यदि जनवरी में बच्चों में त्वचा संबंधी बीमारी के संकेत सामने आए थे, तो यह जानना जरूरी है कि संबंधित सूचना स्वास्थ्य विभाग की निगरानी प्रणाली तक कितनी दूर पहुंची।
जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या RBSK टीमों को इसकी जानकारी दी गई थी। यदि जानकारी मिली थी तो क्या प्रभावित क्षेत्र में विशेष स्क्रीनिंग कराई गई? कितने बच्चों की पहचान हुई? कितनों को उपचार मिला और कितनों को उच्च स्वास्थ्य केंद्र के लिए रेफर किया गया?
यदि सूचना मिली और कार्रवाई नहीं हुई, तो सूचना तंत्र आखिर किस स्तर पर रुका?
RBSK से लेकर जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र तक रिकॉर्ड की जांच जरूरी
इस मामले को केवल RBSK की संभावित विफलता तक सीमित करना उचित नहीं होगा। स्वास्थ्य निगरानी की पूरी कड़ी की जांच जरूरी है। इसमें RBSK टीमों के साथ ANM, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी, स्कूल स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, मलेरिया निगरानी, पोषण व्यवस्था, पेयजल जांच, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला शीघ्र हस्तक्षेप व्यवस्था के रिकॉर्ड का मिलान किया जाना चाहिए।
बिरसा और बैहर क्षेत्र में पिछले कम से कम दो वर्षों के RBSK रिकॉर्ड का स्वतंत्र ऑडिट भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसमें फील्ड विजिट, स्कूल एवं आंगनवाड़ी स्क्रीनिंग, चिन्हित बीमारियों, रेफरल, उपचार और फॉलोअप का रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए।
साथ ही स्क्रीनिंग रजिस्टर और ऑनलाइन रिपोर्ट, टीमों की वास्तविक उपस्थिति, वाहन लॉगबुक, दवाओं के वितरण और खर्च से जुड़े रिकॉर्ड का भी मिलान किया जाना चाहिए।
22 मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल—पहली चेतावनी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
अब जनवरी से लेकर बच्चों की मौतों तक की पूरी स्वास्थ्य विभागीय टाइमलाइन तैयार करना जरूरी है। इसमें बीमारी की पहली सूचना, RBSK टीम की विजिट, स्क्रीनिंग, रिपोर्टिंग, रेफरल, उपचार और फॉलोअप के साथ-साथ प्रभावित क्षेत्र में बीमारी और मौतों की स्थिति को शामिल किया जाना चाहिए।
सवाल सीधे हैं—यदि जनवरी में त्वचा रोग के संकेत मिले थे तो क्या RBSK ने उसका संज्ञान लिया? क्या बच्चों की दोबारा जांच हुई? क्या जिला स्तर पर समीक्षा की गई? और यदि नहीं हुई तो जिम्मेदारी किसकी है?
बिरसा के बीएमओ डॉ. निमिष गौतम के अनुसार, प्रभावित क्षेत्रों में RBSK की दो टीमें कार्य कर रही हैं। प्रत्येक टीम में करीब पांच सदस्य होते हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने लगभग डेढ़ माह पूर्व बीएमओ का प्रभार लिया है और पूर्व में RBSK के कार्यों की जानकारी लेकर ही स्थिति स्पष्ट कर सकेंगे।
अब जरूरत आरोप लगाने से ज्यादा रिकॉर्ड सामने लाने और स्वतंत्र जांच की है। क्योंकि मामला केवल 22 बच्चों की मौत का नहीं, बल्कि उन शुरुआती संकेतों का भी है, जिन पर समय रहते कार्रवाई हुई या नहीं—इसका जवाब पूरे सिस्टम को देना होगा।
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