अब नेताओं के केस में ‘तारीख पर तारीख’ नहीं! एक साल में ट्रायल पूरा करने का सुझाव
No More ‘Date After Date’ for Politicians’ Cases! Suggestion to Complete Trials Within One Year.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, नई दिल्ली/भोपाल। भारतीय राजनीति में आपराधिक मामलों की लंबी पेंडेंसी अब सिर्फ न्यायपालिका की समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर सवाल बनती जा रही है। सांसदों और विधायकों के खिलाफ वर्षों से लंबित आपराधिक मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की गई वरिष्ठ अधिवक्ता एवं एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया की 22वीं रिपोर्ट ने व्यवस्था की सुस्त रफ्तार पर बड़ा सवाल खड़ा किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ देशभर में 4,192 आपराधिक मामले ट्रायल के स्तर पर लंबित हैं। इनमें 519 मामले 10 साल से अधिक पुराने हैं। लगभग 700 मामले अभी जांच के स्तर पर हैं और इनमें 360 मामले तीन साल से अधिक समय से चार्जशीट का इंतजार कर रहे हैं।
यह आंकड़ा सवाल करता है—जब आम नागरिक के लिए न्याय में देरी को गंभीर समस्या माना जाता है, तो जनप्रतिनिधियों से जुड़े मुकदमों में वर्षों की देरी आखिर क्यों?
4 हजार से ज्यादा मामले, फिर भी रफ्तार सुस्त क्यों?
रिपोर्ट में मामलों की धीमी प्रगति के कई कारण सामने रखे गए हैं। इनमें विशेष अदालतों पर नियमित मामलों का अतिरिक्त बोझ, आरोपियों की तारीखों पर अनुपस्थिति, गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित करने में देरी, अभियोजन की कमजोर तैयारी और हाईकोर्ट स्तर पर निगरानी की कमी जैसे मुद्दे शामिल हैं।
2025 में 1,243 मामलों के निपटारे के बावजूद उसी वर्ष 1,050 नए मामले सामने आए। यानी पुराने मामलों का बैकलॉग घटाने की कोशिश के समानांतर नए मामलों की एंट्री भी जारी रही।
सबसे चिंताजनक तस्वीर उन 519 मामलों की है जो एक दशक से अधिक समय से लंबित हैं। सवाल यह नहीं कि आरोपी दोषी हैं या निर्दोष—यह तय करना अदालत का काम है। असली सवाल यह है कि मामले का अंतिम फैसला आखिर कब होगा?
सांसदों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक—आपराधिक मामलों का साया
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है, जबकि राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 के खिलाफ मामले लंबित बताए गए हैं। इनमें कई मामले गंभीर प्रकृति के हैं।
रिपोर्ट में 28 मुख्यमंत्रियों में से 14 के खिलाफ भी आपराधिक मामलों का उल्लेख किया गया है। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे अधिक 89 मामलों का आंकड़ा बताया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है—किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है। दोषसिद्धि या निर्दोषता का अंतिम निर्णय न्यायालय ही करता है।
यही कारण है कि तेजी से और निष्पक्ष सुनवाई लोकतंत्र के लिए जरूरी है।
एक साल में ट्रायल पूरा करने का फॉर्मूला, दिन-प्रतिदिन सुनवाई का सुझाव
एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए नामित अदालतें इन मामलों को प्राथमिकता दें और उन पर नियमित मामलों का अतिरिक्त बोझ न डाला जाए।
आरोप तय होने के बाद सामान्यतः एक वर्ष के भीतर मुकदमे के निपटारे का सुझाव दिया गया है। तीन वर्ष से अधिक पुराने मामलों में दिन-प्रतिदिन सुनवाई, हाईकोर्ट द्वारा नियमित निगरानी, गवाहों की सुरक्षा के लिए नोडल अभियोजन अधिकारी और केस की जानकारी रियल-टाइम में वेबसाइट पर उपलब्ध कराने जैसे उपाय भी सुझाए गए हैं।
लगातार दो तारीखों पर आरोपी के अनुपस्थित रहने की स्थिति में गैर-जमानती वारंट जारी करने का सुझाव भी रिपोर्ट में शामिल है।
सांसदों और विधायकों के मामलों की शीघ्र सुनवाई का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से विचाराधीन रहा है। वर्ष 2023 के फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर निगरानी की दिशा में महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे।
अब चुनौती साफ है—सिर्फ रिपोर्ट, आदेश और विशेष अदालतें पर्याप्त नहीं होंगी। असली परीक्षा उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है।
लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, लेकिन न्यायालय यह तय करते हैं कि किसी आरोपी पर लगाए गए आरोप कानून की कसौटी पर कितने सही हैं। इसलिए जरूरी है कि मुकदमों का फैसला न राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित हो, न वर्षों की देरी में दब जाए।
4,192 मामले सिर्फ एक आंकड़ा नहीं हैं—यह न्याय व्यवस्था की गति, राजनीति की विश्वसनीयता और लोकतंत्र में जनता के भरोसे की परीक्षा है।
Legal Disclaimer
This article is based on reported court proceedings and available data; pending criminal cases do not establish guilt, and allegations remain subject to judicial determination.