जनता का पैसा, CAG की रिपोर्ट और सिस्टम की चुप्पी—10 साल का हिसाब कौन देगा?
Public Money, CAG Reports and Systemic Silence — Who Will Answer for the Last 10 Years?

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, नई दिल्ली/भोपाल। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्टें हर साल सरकारी खर्च, राजस्व और योजनाओं के क्रियान्वयन की तस्वीर सामने लाती हैं। संसद और विधानसभाओं में रिपोर्टें पेश होती हैं, अनियमितताओं पर सवाल उठते हैं और कई बार सरकारें जवाब भी देती हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल आज भी कायम है—ऑडिट में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी धन के संभावित नुकसान के बाद वास्तविक वसूली कितनी हुई?
पिछले करीब एक दशक की विभिन्न CAG रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर बताती है कि समस्या केवल किसी एक सरकार, दल या राज्य तक सीमित नहीं है। भाजपा, कांग्रेस, AAP, TMC या अन्य दलों की सरकारों वाले राज्यों में भी CAG ने अलग-अलग समय पर वित्तीय प्रबंधन, राजस्व संग्रह, लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्र और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए हैं।
लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा—CAG द्वारा बताई गई ‘अनियमितता’, ‘वित्तीय प्रभाव’ या ‘संभावित नुकसान’ को सीधे ‘घोटाले’ या चोरी हुई रकम मान लेना सही नहीं है। कई मामलों में सरकार के जवाब, विभागीय जांच, रिकवरी और PAC की कार्रवाई के बाद अंतिम स्थिति बदल सकती है।
फिर भी सवाल गंभीर है—यदि सरकारी पैसे के उपयोग पर ऑडिट आपत्ति वर्षों तक बनी रहती है, तो उसका अंतिम हिसाब जनता के सामने कब आएगा?
उपयोगिता प्रमाण-पत्र से लेकर GST तक—कागजों में अटका हजारों करोड़ का हिसाब
विभिन्न CAG रिपोर्टों में Utilisation Certificates (UCs) के लंबे समय से लंबित रहने का मुद्दा सामने आता रहा है। उपयोगिता प्रमाण-पत्र यह बताने का महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है कि किसी योजना या मद के लिए जारी सरकारी धन का निर्धारित उद्देश्य के लिए उपयोग हुआ या नहीं।
2024-25 के खातों से संबंधित CAG निष्कर्षों में बड़ी संख्या में लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों का उल्लेख किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 33,973 UCs से संबंधित करीब ₹54,282 करोड़ की राशि लंबित थी।
यह आंकड़ा अपने आप में किसी घोटाले का प्रमाण नहीं है। लेकिन वर्षों तक उपयोगिता प्रमाण-पत्र लंबित रहना वित्तीय निगरानी और जवाबदेही की गंभीर कमजोरी जरूर दर्शाता है।
यही समस्या सरकारी योजनाओं के खर्च में भी दिखाई देती है। कई बार बजट में बड़ी राशि आवंटित होती है, लेकिन समय पर खर्च नहीं हो पाती। ऐसी रकम को ‘बचत’ बताया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जिस योजना के लिए पैसा रखा गया था, उसका निर्धारित लक्ष्य कितना हासिल हुआ?
PMKVY से GST तक—ऑडिट ने डेटा और सिस्टम पर भी उठाए सवाल
सरकारी योजनाओं की परफॉर्मेंस ऑडिट केवल खर्च की रकम नहीं देखती, बल्कि यह भी जांचती है कि योजना का वास्तविक लाभ लक्षित लोगों तक पहुंचा या नहीं।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़ी CAG की परफॉर्मेंस ऑडिट में लाभार्थियों के बैंक खाते और भुगतान से जुड़े डेटा में गंभीर कमियां सामने आने की बात कही गई। ऐसे मामलों में सवाल केवल रकम का नहीं, बल्कि लाभार्थी की वास्तविक पहचान और योजना के परिणाम का भी होता है।
इसी तरह GST से संबंधित ऑडिट में भी इनपुट टैक्स क्रेडिट, भुगतान और अन्य वित्तीय आंकड़ों में विसंगतियां सामने आती रही हैं।
यहां सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी सिर्फ जवाब देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। ऑडिट आपत्ति का अंतिम निपटारा कब हुआ, कितनी राशि वसूल हुई और कितने मामलों में जिम्मेदारी तय हुई—यह जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
बैंक फ्रॉड का आंकड़ा और भी बड़ा सवाल छोड़ता है
सरकारी आंकड़ों के अनुसार FY2021 से FY2026 के दौरान ₹1 करोड़ से अधिक राशि वाले हजारों बैंक फ्रॉड मामलों में बड़ी रकम शामिल रही।
आपके मूल मसौदे में दिए गए आंकड़ों के अनुसार 5,607 मामलों में लगभग ₹2.32 लाख करोड़ की राशि शामिल थी, जबकि रिकवरी करीब ₹6,283 करोड़ बताई गई।
यहां भी सावधानी जरूरी है—फ्रॉड में शामिल राशि और अंतिम रूप से सरकार/बैंक को होने वाला शुद्ध नुकसान एक ही चीज नहीं है। कई मामलों में संपत्ति जब्ती, बीमा, न्यायिक प्रक्रिया या अन्य माध्यमों से बाद में रिकवरी हो सकती है।
फिर भी इतना बड़ा अंतर एक असहज सवाल जरूर पैदा करता है—
जब हजारों करोड़ का वित्तीय अपराध सामने आता है, तो जिम्मेदार लोगों से वास्तविक धन-वसूली की प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों होती है?
राज्यों की तस्वीर भी अलग नहीं—दल बदलते हैं, CAG की आपत्तियां नहीं
CAG की रिपोर्टों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनमें वित्तीय अनियमितताएं किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहतीं।
दिल्ली, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात सहित विभिन्न राज्यों की अलग-अलग अवधि की रिपोर्टों में राजस्व बकाया, बजट प्रबंधन, योजनाओं के खर्च, गलत वर्गीकरण, लंबित प्रमाण-पत्र और वित्तीय नियंत्रण से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं।
यही कारण है कि CAG को केवल किसी सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार की तरह देखना समस्या का समाधान नहीं है।
असल सवाल होना चाहिए—
जिस सरकार के कार्यकाल में आपत्ति सामने आई, उसने क्या कार्रवाई की?
कितना पैसा वापस आया?
कितने अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई?
और कितनी आपत्तियां वर्षों बाद भी लंबित हैं?
CAG रिपोर्ट में रकम दिखती है, लेकिन रिकवरी का ट्रैकर कहां है?
यह पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
CAG का मुख्य कार्य ऑडिट करना, निष्कर्ष देना और विधायिका के सामने रिपोर्ट रखना है। CAG स्वयं हर मामले में सीधे पैसा वसूलने वाली जांच एजेंसी नहीं है। आगे की कार्रवाई संबंधित विभाग, सरकार, PAC और जहां आवश्यक हो वहां जांच/कानूनी एजेंसियों के माध्यम से होती है।
इसलिए यह कहना कि “CAG ने पैसा बताया लेकिन CAG ने वसूली नहीं की” तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन जनता का सवाल इससे खत्म नहीं होता।
यदि CAG ने किसी मामले में वित्तीय अनियमितता या नुकसान की ओर इशारा किया है तो उसके बाद क्या हुआ—इसका सार्वजनिक ट्रैकिंग सिस्टम क्यों नहीं होना चाहिए?
एक ऐसी व्यवस्था हो सकती है जिसमें प्रत्येक बड़ी ऑडिट आपत्ति के सामने स्पष्ट रूप से दिखाई दे:
ऑडिट आपत्ति → विभाग का जवाब → PAC की स्थिति → जांच → जिम्मेदारी → रिकवरी → मामला बंद होने की तारीख।
तभी जनता को पता चलेगा कि रिपोर्ट केवल संसद की मेज तक पहुंची या उसका असर सरकारी खजाने तक भी पहुंचा।
घोटाला’ शब्द से आगे बढ़कर असली सवाल—जवाबदेही कौन तय करेगा?
सरकारी वित्तीय मामलों में राजनीतिक आरोप लगाना आसान है। लेकिन वास्तविक जवाबदेही तय करने के लिए दस्तावेज, जांच और कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।
CAG की रिपोर्ट में किसी वित्तीय अनियमितता का उल्लेख होना अपने आप में किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी सिद्ध नहीं करता।
लेकिन यदि वर्षों तक एक ही आपत्ति लंबित रहती है, तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि—
- कितनी राशि पर आपत्ति दर्ज हुई?
- कितनी राशि वास्तव में वसूल हुई?
- कितने मामलों में विभागीय कार्रवाई हुई?
- कितने मामले PAC के सामने लंबित हैं?
- कितने मामलों में जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की?
- और कितनी आपत्तियां बिना अंतिम निष्कर्ष के वर्षों से लंबित हैं?
दस साल की रिपोर्टों से निकला सबसे बड़ा सबक
पिछले एक दशक की CAG रिपोर्टों को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय सिस्टम ऑडिट के रूप में देखने की जरूरत है।
सरकार कोई भी हो, राज्य कोई भी हो और राजनीतिक दल कोई भी—यदि सरकारी धन का उपयोग हो रहा है तो उसके हर रुपये का हिसाब होना चाहिए।
CAG की रिपोर्ट अंतिम फैसला नहीं होती, लेकिन वह सिस्टम के लिए चेतावनी जरूर होती है।
अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां ऑडिट आपत्तियां केवल रिपोर्टों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित न रहें, बल्कि उनकी रिकवरी, कार्रवाई और निपटारे की समयबद्ध निगरानी भी हो।
क्योंकि आखिरकार सवाल किसी पार्टी का नहीं है।
सवाल जनता के पैसे का है।
और जनता यह जानना चाहती है—
रिपोर्ट तो आ गई, अब पैसा वापस कब आएगा?
Legal Disclaimer
CAG audit findings indicate reported irregularities, not proven guilt; allegations require verification, departmental action, and final judicial determination before liability is established.