E20 की चमक में छिपा प्रदूषण? एथेनॉल प्लांटों के ‘वेस्ट’ पर सरकार से बड़ा सवाल.
Pollution Hidden Behind the Shine of E20? A Big Question for the Government Over Ethanol Plant Waste.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/जबलपुर/भोपाल। भारत सरकार की E20 नीति के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को लाभ मिलेगा। लेकिन एथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया, औद्योगिक अपशिष्ट के निस्तारण और स्थानीय पर्यावरण पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं।
मुद्दा सिर्फ वाहन के माइलेज या इंजन की चिंता तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की होड़ में जल, जमीन, हवा और ग्रामीण आबादी की सुरक्षा के लिए निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का कितना पालन हो रहा है?
बालाघाट के खापा और बासी क्षेत्र में संचालित एथेनॉल इकाइयों को लेकर सामने आए ग्रामीणों के आरोपों ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि और प्रत्येक मामले में आधिकारिक जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।
E20 पर बहस के बीच असली सवाल—एथेनॉल प्लांट का पर्यावरणीय असर कौन देखेगा?
एथेनॉल उत्पादन को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन डिस्टिलरी उद्योग में पानी की खपत, अपशिष्ट जल, स्पेंट वॉश, वायु उत्सर्जन और ठोस अपशिष्ट का उचित प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि औद्योगिक अपशिष्ट का निर्धारित मानकों के अनुसार उपचार और निस्तारण नहीं किया जाए, तो इसका असर भूजल, कृषि भूमि, जल स्रोत और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।
पर्यावरण समूहों द्वारा भी एथेनॉल एवं डिस्टिलरी इकाइयों से निकलने वाले विभिन्न प्रदूषकों को लेकर चिंता जताई जाती रही है। हालांकि, किसी विशेष प्लांट से किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या या पर्यावरणीय क्षति का संबंध स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण और नियामक जांच जरूरी है।
पानी की खपत और अपशिष्ट प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती
एथेनॉल उत्पादन में पानी की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है। इसलिए प्लांटों के आसपास भूजल प्रबंधन और जल संरक्षण भी महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
दूसरी ओर, उत्पादन प्रक्रिया से निकलने वाले अपशिष्ट का यदि वैज्ञानिक तरीके से उपचार न हो तो जल और मिट्टी प्रदूषण का खतरा पैदा हो सकता है।
यही वजह है कि Zero Liquid Discharge (ZLD) जैसी व्यवस्थाओं और पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों का प्रभावी अनुपालन केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।
पंजाब का जीरा बना चेतावनी का उदाहरण, लेकिन हर प्लांट की कहानी अलग
पंजाब के जीरा क्षेत्र में मालब्रोस डिस्टिलरी को लेकर लंबे समय तक ग्रामीण आंदोलन चला था। स्थानीय लोगों ने प्लांट के कारण भूजल और पर्यावरण प्रभावित होने के आरोप लगाए थे। लंबे विरोध के बाद पंजाब सरकार ने जनवरी 2023 में प्लांट बंद करने का आदेश दिया था।
इस घटनाक्रम का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि औद्योगिक विकास और स्थानीय पर्यावरणीय चिंताओं के बीच संतुलन कितना जरूरी है।
हालांकि, जीरा के मामले को मध्यप्रदेश के प्रत्येक एथेनॉल प्लांट पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा। हर इकाई की तकनीक, पर्यावरणीय स्वीकृति, अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था और नियामकीय स्थिति अलग-अलग होती है।
इसीलिए सवाल यह होना चाहिए कि क्या मध्यप्रदेश के प्रत्येक एथेनॉल प्लांट का स्वतंत्र और नियमित पर्यावरणीय ऑडिट हो रहा है?
खापा-बासी में 14 बकरियों की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल
बालाघाट जिले के खापा और बासी क्षेत्र में संचालित एथेनॉल इकाइयों को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, विसाग बायो फ्यूल्स के एथेनॉल प्लांट से निकलने वाले कथित दूषित अपशिष्ट को खाने के बाद 14 बकरियों की मौत होने और एक बैल के बीमार होने का मामला सामने आया था।
बताया जाता है कि पशु मालिक और कंपनी प्रबंधन के बीच करीब ढाई लाख रुपये के मुआवजे को लेकर मामला आपसी स्तर पर सुलझ गया। हालांकि, इस घटना की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच, पशुओं का आधिकारिक पोस्टमार्टम और अपशिष्ट के नमूनों की प्रयोगशाला जांच हुई या नहीं, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना जरूरी है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—यदि पशुओं की मौत का कारण औद्योगिक अपशिष्ट होने की आशंका थी, तो उसकी वैज्ञानिक जांच क्यों नहीं कराई गई?
सिर्फ मुआवजे से मामला समाप्त करना पर्यावरणीय जोखिम का समाधान नहीं हो सकता। यदि अपशिष्ट वास्तव में मानकों के विपरीत था, तो उसका प्रभाव केवल पशुओं तक सीमित रहने की गारंटी नहीं दी जा सकती।
ग्रामीणों की चिंता—आज पशु, कल इंसान?
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि एथेनॉल प्लांटों के आसपास दुर्गंध, कथित प्रदूषित पानी और औद्योगिक कचरे को लेकर लंबे समय से चिंता बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि अपशिष्ट प्रबंधन में थोड़ी भी लापरवाही हुई तो इसका असर खेती, भूजल और पशुधन पर पड़ सकता है।
हालांकि, किसी बीमारी, पशु मृत्यु या मानव स्वास्थ्य समस्या को एथेनॉल प्लांट से जोड़ने से पहले वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
यही कारण है कि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग के सामने अब केवल शिकायतों का जवाब देने की चुनौती नहीं है, बल्कि पारदर्शी वैज्ञानिक जांच कर वास्तविक स्थिति सामने रखने की जिम्मेदारी भी है।
सरकार E20 बढ़ा रही है तो निगरानी भी बढ़ानी होगी
E20 का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता कम करना है। लेकिन ऊर्जा नीति की सफलता तभी मानी जाएगी जब उसके पर्यावरणीय प्रभावों को भी समान गंभीरता से नियंत्रित किया जाए।
मध्यप्रदेश में एथेनॉल उत्पादन का विस्तार हो रहा है तो प्रत्येक प्लांट के संबंध में कुछ बुनियादी सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए—
- क्या प्लांट के पास वैध पर्यावरणीय स्वीकृति है?
- क्या निर्धारित ZLD या अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है?
- भूजल और आसपास के जल स्रोतों की नियमित जांच होती है या नहीं?
- स्पेंट वॉश और अन्य औद्योगिक अपशिष्ट का निस्तारण किस तरीके से किया जा रहा है?
- क्या प्रदूषण नियंत्रण विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण और नमूना परीक्षण किए जाते हैं?
- खापा-बासी में पशुओं की मौत के मामले की कोई वैज्ञानिक जांच हुई या नहीं?
कागजों पर पर्यावरणीय अनुपालन और जमीन पर वास्तविक स्थिति के बीच अंतर नहीं होना चाहिए।
अब निगाहें प्रशासन की जांच पर
बालाघाट के खापा-बासी से उठे सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि स्वतंत्र निरीक्षण, वैज्ञानिक नमूना परीक्षण और सार्वजनिक जांच रिपोर्ट से मिलना चाहिए।
यदि प्लांट नियमों के अनुसार संचालित हो रहे हैं तो प्रशासन को तथ्यों के साथ ग्रामीणों की आशंकाएं दूर करनी चाहिए। और यदि कहीं पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन मिलता है तो जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
E20 का लक्ष्य देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना हो सकता है, लेकिन विकास की कीमत ग्रामीणों के पानी, जमीन, पशुधन और स्वास्थ्य से नहीं चुकाई जानी चाहिए।
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