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अधिमान्यता का सच: बंद अखबार, चालू कार्ड और सरकारी सुविधाएं.

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The Truth Behind Accreditation: Defunct Newspapers, Active Press Cards, and Government Perks.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल। भोपाल। मध्यप्रदेश में पत्रकार अधिमान्यता व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। जनसंपर्क संचालनालय, मध्यप्रदेश शासन ने दैनिक स्वतंत्र समय भोपाल के नाम पर जारी अधिमान्यता कार्डों के कथित दुरुपयोग के मामले में अशोकनगर, छतरपुर और दमोह के तीन पत्रकारों की अधिमान्यता तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दी है। संबंधित व्यक्तियों को कार्ड जमा करने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।

बताया गया है कि जिन व्यक्तियों के नाम पर अधिमान्यता जारी थी, वे संबंधित समाचार पत्र में कार्यरत नहीं पाए गए। इसके बावजूद वे अधिमान्यता से मिलने वाली सुविधाओं और सरकारी कार्यक्रमों में भागीदारी का लाभ ले रहे थे।

क्या यह केवल तीन जिलों का मामला है?

पत्रकारिता जगत में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि प्रदेश में कुछ बंद या निष्क्रिय प्रकाशनों के नाम पर भी अधिमान्यता कार्ड सक्रिय बने हुए हैं। यदि ऐसा है, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि व्यवस्था की गंभीर कमजोरी मानी जाएगी।

वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इससे वास्तविक पत्रकारों के अधिकार प्रभावित होते हैं और अधिमान्यता प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

अधिमान्यता व्यवस्था में कहां हैं कमियां?

नियमित सत्यापन का अभाव

अधिमान्यता जारी होने के बाद कई मामलों में कार्यरत स्थिति की नियमित जांच नहीं हो पाती।

बंद प्रकाशनों की समीक्षा नहीं

कई बार प्रकाशन बंद होने या निष्क्रिय होने के बाद भी पुराने रिकॉर्ड अपडेट नहीं किए जाते।

राजनीतिक और स्थानीय प्रभाव

पत्रकार संगठनों और मीडिया जगत में समय-समय पर यह आरोप लगते रहे हैं कि कुछ मामलों में प्रभाव और सिफारिशें प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

डिजिटल निगरानी की कमी

अधिमान्यता धारकों की अद्यतन और सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं होने से पारदर्शिता प्रभावित होती है।

अब उठ रही हैं बड़े सुधारों की मांग

विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि केवल कार्ड निरस्त करना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे प्रदेश में व्यापक सत्यापन अभियान चलाया जाना चाहिए।

प्रमुख सुझाव

  • जिला एवं तहसील स्तर पर अधिमान्यता समीक्षा समितियों का गठन।
  • प्रत्येक अधिमान्यता कार्ड का वार्षिक सत्यापन।
  • डिजिटल डैशबोर्ड पर अधिमान्यता धारकों की सार्वजनिक जानकारी।
  • बंद प्रकाशनों से जुड़े कार्डों की स्वतः समीक्षा।
  • फर्जी जानकारी पाए जाने पर त्वरित निरस्तीकरण।
  • डिजिटल मीडिया पत्रकारों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी मानदंड।

पत्रकारिता की साख का सवाल

यह मुद्दा केवल कार्ड या सुविधाओं तक सीमित नहीं है। यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है।

जब वास्तविक पत्रकार मैदान में संघर्ष कर खबरें जुटाते हैं और दूसरी ओर कथित रूप से गैर-कार्यरत लोग अधिमान्यता का लाभ लेते हैं, तो पूरी व्यवस्था की साख प्रभावित होती है।

क्या प्रदेशव्यापी अभियान की जरूरत है?

जनसंपर्क संचालनालय की ताजा कार्रवाई को एक शुरुआत माना जा रहा है। अब नजर इस बात पर है कि क्या सरकार पूरे प्रदेश में अधिमान्यता की व्यापक समीक्षा कर पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था स्थापित करेगी।

पत्रकारिता की गरिमा बचाने के लिए आवश्यक है कि अधिमान्यता केवल उन्हीं लोगों तक सीमित रहे जो वास्तव में समाचार संकलन और जनहित पत्रकारिता से जुड़े हैं।

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