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सच की राह में दबावों का जाल! पत्रकारिता की आजादी पर बड़ा सवाल.

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A Web of Pressures on the Path of Truth! Big Questions Over the Freedom of Journalism.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल। लोकतंत्र में पत्रकारिता को राष्ट्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। यह केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी का प्रतीक है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और समाज के बीच सेतु बनना, जनहित के मुद्दों को सामने लाना और जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाना है।

इसी विषय पर आयोजित एक गोष्ठी में जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना ने पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर अपने विचार व्यक्त किए।

क्या चौथा स्तंभ अपने मूल स्वरूप से दूर हो रहा है?

डॉ. सक्सेना ने कहा कि पत्रकारिता की धरातलीय स्थिति को देखें तो कई गंभीर सवाल सामने आते हैं। उनका मानना है कि आज बहुत कम पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने मूल दायित्वों का पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन कर पा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अनुमानतः केवल 20 से 25 प्रतिशत पत्रकारिता ही अपने वास्तविक स्वरूप में कार्य कर रही है, वह भी अनेक प्रकार के दबावों और चुनौतियों के बीच।

पत्रकारिता पर दबाव के पीछे कौन से कारण?

गोष्ठी में यह प्रश्न भी उठाया गया कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं जो पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रही हैं।

राजनीतिक दबाव, आर्थिक निर्भरता, विज्ञापनों की मजबूरी, बढ़ते कानूनी विवाद, धमकियां और सामाजिक दबाव जैसे कई कारकों को इसके संभावित कारणों के रूप में देखा जा रहा है। इन परिस्थितियों ने पत्रकारिता की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर असर डाला है।

सत्य की राह आसान नहीं

डॉ. सक्सेना ने कहा कि आज का पत्रकार कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। एक ओर उस पर सत्य को सामने लाने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर उसे संस्थागत दबावों, आर्थिक असुरक्षा और व्यक्तिगत जोखिमों का सामना भी करना पड़ता है।

ऐसी परिस्थितियों में कुछ पत्रकार समझौते का रास्ता चुन लेते हैं, जबकि कई पत्रकार तमाम कठिनाइयों के बावजूद निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए लगातार प्रयासरत हैं।

पत्रकारिता का संकट, लोकतंत्र की भी चुनौती

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का संकट केवल मीडिया जगत तक सीमित नहीं है। जब समाचार निष्पक्ष नहीं होंगे, जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाएंगे और सत्य दबने लगेगा, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था भी प्रभावित होगी।

समाज की सही निर्णय लेने की क्षमता भी कमजोर पड़ सकती है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा केवल मीडिया की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

मूल्यों की ओर लौटने की जरूरत

डॉ. अनुराग सक्सेना ने कहा कि आज पत्रकारिता को अपने मूल मूल्यों—सत्य, निष्पक्षता, साहस और जनहित—की ओर लौटने की आवश्यकता है। साथ ही पत्रकारों को ऐसा सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जहां वे बिना किसी भय या दबाव के अपना कर्तव्य निभा सकें।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रह सकता है, जब उसकी नींव सत्य और स्वतंत्रता पर टिकी हो। यदि यह स्तंभ कमजोर होगा तो लोकतंत्र की पूरी संरचना प्रभावित होगी। इसलिए समय की मांग है कि पत्रकारिता को कमजोर करने वाली चुनौतियों की पहचान कर उसे उसकी गरिमा और सम्मान के साथ पुनः स्थापित किया जाए।

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