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बुंदेलखंड की आस्था का महाकुंभ: करीला धाम में रंग पंचमी पर लाखों की भीड़.

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Mahakumbh of Faith in Bundelkhand: Lakhs of Devotees Gather at Karila Dham on Rang Panchami.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद , अशोकनगर (मुंगावली)। रामायण काल की त्रेता युगीन स्मृतियों से जुड़ी मध्य प्रदेश की पावन धरती आज भी राम-सीता की कथा को जीवंत बनाए हुए है। अशोकनगर जिले की मुंगावली तहसील में स्थित प्रसिद्ध करीला धाम मंदिर में हर वर्ष रंग पंचमी के अवसर पर भव्य तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता है। यह मेला, जिसे करीला मेला या रंग पंचमी महोत्सव कहा जाता है, लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है और बुंदेलखंड की लोक परंपराओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

लव-कुश जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है करीला धाम

करीला धाम अशोकनगर से करीब 35-40 किलोमीटर दूर कानीखेड़ी गांव की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मान्यता है कि वनवास के दौरान माता सीता यहां महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पहुंचीं, जहां लव और कुश का जन्म हुआ। मंदिर परिसर में माता जानकी की मुख्य प्रतिमा के साथ भगवान राम, लक्ष्मण और महर्षि वाल्मीकि की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं।

200 साल पुरानी परंपरा, चमत्कारी गुफा की भी मान्यता

करीला धाम की खोज लगभग 120 वर्ष पहले दीपनाखेड़ा के एक महंत द्वारा किए जाने की मान्यता है। यहां स्थित एक चमत्कारी गुफा भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है, जो वर्ष में केवल एक बार खुलती है। कहा जाता है कि गुफा के भीतर जलता हुआ दीपक मिलता है, जो भक्तों के लिए आस्था और आश्चर्य का विषय बन जाता है।

करीला मेला बुंदेलखंड की सबसे प्राचीन परंपराओं में से एक माना जाता है, जिसकी परंपरा 200 वर्ष से भी अधिक पुरानी बताई जाती है।

8 मार्च से शुरू होगा तीन दिवसीय मेला

रंग पंचमी को होली के अंतिम चरण के रूप में मनाया जाता है, लेकिन करीला धाम में यह दिन लव-कुश जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखता है। वर्ष 2026 में यह भव्य मेला 8 मार्च से शुरू होकर तीन दिनों तक चलेगा।

पिछले वर्षों में यहां 20 से 30 लाख तक श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी है। इस बार भी प्रशासन ने मेले को लेकर व्यापक तैयारियां की हैं। सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगभग 100 सीसीटीवी कैमरे, 1700 पुलिसकर्मी, महिला पंडाल, अलग-अलग सेक्टर और प्लास्टिक मुक्त अभियान की व्यवस्था की गई है।

प्रशासन ने संभाली तैयारियों की कमान

मेले को लेकर जिला प्रशासन पूरी तरह सक्रिय है। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक द्वारा व्यवस्थाओं का लगातार जायजा लिया जा रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बस किराया निर्धारण (अशोकनगर से लगभग 50 रुपये) और यातायात व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है।

30 एकड़ में सजता है आस्था और संस्कृति का मेला

करीला मेला लगभग 30 एकड़ क्षेत्र में फैलता है। पहाड़ी के चारों ओर सैकड़ों दुकानें सजती हैं, जहां पारंपरिक व्यंजन, खिलौने, बर्तन, धार्मिक सामग्री और विशेष कड़ाही (कम तेल में पकाने की मान्यता वाली) उपलब्ध रहती हैं।

इसके अलावा मेले में झूले, फेरिस व्हील, रामलीला, भजन-कीर्तन, कठपुतली शो और लोक नृत्य जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

राई नृत्य बनता है मेले का सबसे बड़ा आकर्षण

करीला मेले का सबसे प्रमुख आकर्षण राई नृत्य है, जिसे लव-कुश बधाई राई भी कहा जाता है। मन्नत पूरी होने पर महिलाएं रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजकर समूह में तेज गति से राई नृत्य करती हैं।

ढोल-नगाड़ों की गूंज और उड़ते गुलाल के बीच हजारों महिलाएं माता जानकी की आराधना करती हैं। बुंदेलखंड की यह अनूठी लोक परंपरा संतान प्राप्ति, सुख-समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली की कामना से जुड़ी मानी जाती है।

रात में दीपों से जगमगाता है मंदिर परिसर

रात के समय मंदिर परिसर में आरती और दीपोत्सव का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। श्रद्धालु दूध, फल और चंदन चढ़ाकर माता जानकी की पूजा करते हैं और प्रसाद के रूप में ‘राई’ का वितरण किया जाता है।

आस्था और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम

करीला धाम का रंग पंचमी मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत का भी जीवंत उदाहरण है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु संतान प्राप्ति, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

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