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टूरिंग टॉकीज: मिट्टी की खुशबू में लिपटा सिनेमा का स्वर्णिम दौर.

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Touring Talkies: The Golden Era of Cinema Wrapped in the Fragrance of the Earth.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल। एक समय था, जब सिनेमा केवल शहरों के बड़े सिनेमाघरों तक सीमित नहीं था। गांवों, कस्बों और मेलों में टूरिंग टॉकीज ही मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करती थी। जहां स्थायी सिनेमाघर नहीं थे, वहां ट्रकों पर लदे तंबू, प्रोजेक्टर, जनरेटर और फिल्मी रीलें लोगों तक सिनेमा का जादू पहुंचाती थीं।

लोग कई किलोमीटर पैदल, बैलगाड़ियों या बसों से सफर कर फिल्म देखने पहुंचते थे। टिकट हाथ में आते ही चेहरे पर जो मुस्कान होती थी, वह आज भी यादों में ताजा है। आज भले ही मोबाइल और ओटीटी प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन की दुनिया बदल दी हो, लेकिन टूरिंग टॉकीज की यादें अब भी दिलों में जीवित हैं।

जब गांव-गांव पहुंचता था सिनेमा का कारवां

टूरिंग टॉकीज की शुरुआत लगभग एक सदी पहले हुई थी। 1970 के दशक में देशभर में लगभग एक हजार से अधिक मोबाइल सिनेमा इकाइयों के संचालन का उल्लेख मिलता है।

महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में इनका विशेष प्रभाव रहा। मध्य प्रदेश के सागर, भोपाल, जबलपुर, रीवा सहित अनेक जिलों के मेलों और ग्रामीण इलाकों में टूरिंग टॉकीज किसी उत्सव से कम नहीं होती थी।

मेले का सबसे बड़ा आकर्षण होता था फिल्म का तंबू

गणेश उत्सव, नवरात्रि, रामलीला और स्थानीय मेलों में टूरिंग टॉकीज का तंबू सबसे ज्यादा भीड़ खींचता था।

बाहर बड़े-बड़े पोस्टरों पर लिखा होता—“आज का शो: शोले”, “मुगल-ए-आज़म”, “अमर अकबर एंथनी”

लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीत, रोशनी से जगमगाता तंबू और टिकट खिड़की पर लगी लंबी कतारें—यही उस दौर की पहचान थीं।

रील रुकती थी तो भी नहीं रुकता था उत्साह

बिजली न होने पर जनरेटर की आवाज के बीच फिल्म चलती थी। कभी रील टूट जाती, कभी मशीन रुक जाती, लेकिन दर्शकों का उत्साह कम नहीं होता था।

बच्चे ताली बजाते, बुजुर्ग मुस्कुराते और कुछ ही देर बाद फिर पर्दे पर कहानी जीवंत हो उठती।

सिर्फ फिल्म नहीं, पूरे गांव का त्योहार था

टूरिंग टॉकीज केवल मनोरंजन नहीं थी, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर भी थी।

महिलाएं परिवार के साथ आतीं, बच्चे पहली बार बड़े पर्दे पर दुनिया देखते और बुजुर्ग वर्षों तक उन फिल्मों की कहानियां सुनाते रहते।

यही वह दौर था, जब एक फिल्म पूरे गांव को एक साथ बैठाकर हंसाती, रुलाती और सोचने पर मजबूर कर देती थी।

डिजिटल दौर में फीकी पड़ी रीलों की दुनिया

1990 के दशक के बाद टीवी, वीडियो कैसेट, केबल नेटवर्क और बाद में इंटरनेट व ओटीटी प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव ने टूरिंग टॉकीज की लोकप्रियता लगभग समाप्त कर दी।

आज शायद ही कहीं पुराने अंदाज में टूरिंग टॉकीज दिखाई देती हो, लेकिन जिन लोगों ने उसे देखा है, उनके लिए वह सिर्फ सिनेमा नहीं, जीवन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है।

यादों का वह पर्दा आज भी रोशन है

आज मोबाइल की स्क्रीन हथेली में सिमट गई है, लेकिन उस विशाल सफेद परदे के सामने बैठकर पूरे गांव के साथ फिल्म देखने का आनंद अलग ही था।

वह सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि अपनापन, उत्सव और साझा खुशियों का ऐसा अनुभव था, जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।

टूरिंग टॉकीज चली गईं, लेकिन उनकी रीलें आज भी लाखों लोगों की यादों में चल रही हैं।

Disclaimer

यह लेख ऐतिहासिक संदर्भों, उपलब्ध प्रकाशित स्रोतों एवं जनस्मृतियों पर आधारित फीचर सामग्री है। इसमें वर्णित अनुभव विभिन्न व्यक्तियों की स्मृतियों और सार्वजनिक विवरणों पर आधारित हैं, जिन्हें सार्वभौमिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

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