बालाघाट में युवाओं ने थामा चॉक-डस्टर, सरकार ने धोया हाथ.
In Balaghat, Youth Took Up the Chalk-Duster, While the Government Turned a Blind Eye.
Anand Tamrakar, Senior Correspondent, Bhopal, MP Samwad.
In Balaghat, two government schools remain teacherless despite repeated requests to authorities. Villagers’ educated youth have stepped in, teaching 400+ students at minimal wages. With regular and guest teachers absent, students’ education suffers. The community urges immediate government intervention to secure the children’s future.
MP संवाद, बालाघाट जिले के कटंगी विकासखंड के दो सरकारी स्कूलों – बावनथड़ी गुरुकुल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बम्हनी और महात्मा गांधी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय टेकाड़ी – में आज तक न तो नियमित शिक्षक मिले और न ही अतिथि शिक्षक। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को दर्जनों बार निवेदन भेजे गए, लेकिन कहीं से मदद नहीं मिली।
गांव के युवाओं ने उठाई जिम्मेदारी
निराश स्कूल प्रशासन ने गांव के पढ़े-लिखे युवाओं को आगे आने की अपील की। युवाओं ने इसे स्वीकार किया और वे मनरेगा मजदूरों की मजदूरी से भी कम मानदेय पर बच्चों को पढ़ाने लगे। बावनथड़ी गुरुकुल में इस समय 10 से अधिक युवक बच्चों की पढ़ाई संभाल रहे हैं।
बीटेक पास भी पढ़ा रहा है बच्चों को
गांव के युवाओं में कृणाल मेश्राम जैसे बीटेक ग्रेजुएट भी हैं, जो सरकारी नौकरी की तैयारी के साथ-साथ बच्चों को गणित और भौतिकी पढ़ाते हैं। इसी तरह दिगंबर पुष्पतोड़े जैसे युवाओं का कहना है कि भले ही मेहनताना कम है, लेकिन बच्चों का भविष्य संवारना उन्हें मानसिक संतोष देता है।
300 से अधिक बच्चों का भविष्य अधर में
बावनथड़ी स्कूल में पहली से 12वीं तक 300 छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं, जबकि टेकाड़ी स्कूल में 100 से ज्यादा बच्चे। बावनथड़ी में केवल 6 सरकारी कर्मचारी हैं, जिनमें से सिर्फ 3 प्राथमिक शिक्षक, 1 हाईस्कूल शिक्षक, 1 प्रभारी प्राचार्य और 1 प्रयोगशाला सहायक हैं। मिडिल स्कूल में एक भी शिक्षक नहीं है। आने वाले दिनों में एक शिक्षक के रिटायर होने से संख्या और घट जाएगी।
मर्जर की अनदेखी, गांव से दूर भटकते बच्चे
2002 में निजी से सरकारी बनाए जाने पर उम्मीद थी कि स्थिति सुधरेगी, लेकिन हालात और बिगड़ गए। न तो पर्याप्त शिक्षक मिले, न ही अतिथि। बच्चों को छात्रवृत्ति, ड्रेस और मध्यान्ह भोजन जैसी सुविधाएं जरूर मिल रही हैं, लेकिन पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित है। पास के स्कूल 10–15 किमी दूर हैं, लेकिन मर्जर करने की दिशा में कोई पहल नहीं की गई।
शासन-प्रशासन से बड़ा सवाल
गांव के लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक सरकारी स्कूल शिक्षकविहीन रहेंगे? क्या इन स्कूलों को जानबूझकर बंद करने की साजिश है? अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा तो सैकड़ों बच्चों का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया जाएगा।