नगरपालिका (संशोधन) अध्यादेश, 2025, सरकार ने अध्यक्षों को दी अजेय ढाल, जवाबदेही पर ताला.
Municipality (Amendment) Ordinance 2025: Government Grants Chairpersons an Invincible Shield, Locks Away Accountability
Harishankar Parashar, Senior Correspondent, Katni, MP Samwad.
Madhya Pradesh’s Municipality (Amendment) Ordinance 2025 shields municipal chairpersons from no-confidence motions, allowing removal only by direct public vote with majority support. The move strengthens leadership stability but raises concerns over reduced accountability and political oversight in local governance.
MP संवाद, भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने नगरपालिका और नगर परिषदों के अध्यक्षों को पार्षदों के अविश्वास प्रस्ताव से बचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब किसी अध्यक्ष को हटाना केवल जनता के हाथ में होगा। इसके लिए सरकार ने मध्यप्रदेश नगरपालिका (संशोधन) अध्यादेश, 2025 लागू कर दिया है।
नए प्रावधानों के अनुसार, अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए नपा क्षेत्र के कुल मतदाताओं के आधे से अधिक का समर्थन गुप्त मतदान में जरूरी होगा। साथ ही, पदभार ग्रहण करने के तीन साल तक वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू ही नहीं की जा सकेगी।
पार्षद बने दर्शक, अध्यक्ष बने अजेय
इस अध्यादेश के बाद अब पार्षदों की भूमिका लगभग खत्म हो गई है।
- पूरे कार्यकाल में केवल एक बार ही अध्यक्ष के खिलाफ वापस बुलाने की प्रक्रिया संभव होगी।
- शिवपुरी सहित उन नगर परिषदों में, जहां अविश्वास की तलवार लटक रही थी, अध्यक्षों को अब बड़ी राहत मिल गई है।
राज्य सरकार ने 9 सितंबर को ही इस अध्यादेश को कैबिनेट से मंजूरी देकर राजपत्र में प्रकाशित करा दिया था।
लोकतंत्र या तानाशाही? उठे सवाल
स्थानीय निकायों में स्थिरता और नेतृत्व मज़बूत करने के नाम पर सरकार ने पार्षदों की ताकत ही छीन ली है।
- जनता को तीन साल तक अध्यक्ष बदलने का अधिकार भी नहीं मिलेगा।
- अध्यादेश फिलहाल छह माह तक प्रभावी रहेगा, उसके बाद इसे विधानसभा में स्थायी कानून के रूप में पारित कराना होगा।
विपक्ष का हमला, जनता की चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर देगा। जहां जनता और पार्षद मिलकर स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय करते थे, अब वहां अध्यक्ष ‘अजेय’ हो गए हैं।
विपक्ष ने इसे “जनप्रतिनिधियों को बंधक बनाने और सत्ता बचाने का राजनीतिक खेल” बताया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या विकास कार्यों के नाम पर सरकार ने लोकतंत्र को ही ‘साइलेंस’ कर दिया है?