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85 सरकारी अस्पतालों की लैब में गड़बड़, सिर्फ 34 NABL प्रमाणित.

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Government hospital lab in Madhya Pradesh showing testing machines and NABL certification issues

Problems in Labs of 85 Government Hospitals, Only 34 NABL Certified.

Samarth Yadav, Legal Consultant, Bhopal, MP Samwad.

In Madhya Pradesh, private companies run labs in 85 government hospitals, but only 34 are NABL certified. Questions arise over delays, uneven testing rates, and transparency. Citizens’ health remains at risk as 200 crore rupees are spent annually, raising concerns about accountability and government oversight.

MP संवाद, भोपाल, मध्य प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ धीरे-धीरे प्राइवेट कंपनियों को सौंपी जा रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस कदम से लोगों को बेहतर सुविधाएँ मिल रही हैं या नहीं? फिलहाल विवाद सरकारी अस्पतालों में चल रही लैब को लेकर है। इन लैब को चलाने वाली कंपनी का दावा है कि उन्होंने केवल सरकार की शर्तों के अनुसार काम किया है।

राज्य के 85 सरकारी अस्पतालों में खून और अन्य जाँच का काम एक प्राइवेट कंपनी के पास है। यहाँ रोज़ाना हजारों टेस्ट होते हैं। जानकारी के अनुसार, साल 2019 में इन लैब को चलाने के लिए टेंडर निकाला गया, जो साइंस हाउस मेडिकल्स प्राइवेट लिमिटेड और पीओसीटी को मिला।

टेंडर की शर्त और विवाद:
टेंडर की बड़ी शर्त थी कि लैब एनएबीएल (NABL) मानकों के अनुसार होनी चाहिए। एनएबीएल यानी National Accreditation Board for Testing and Calibration Laboratories, लैब की गुणवत्ता की जांच करती है। लेकिन उस समय पूरे प्रदेश में कोई भी सरकारी लैब एनएबीएल प्रमाणित नहीं थी।

इस पर सवाल उठते हैं कि जब शुरुआत में कोई भी लैब प्रमाणित नहीं थी, तो सरकार ने उन्हें एनएबीएल दरों पर बिल का भुगतान कैसे किया? सूत्रों के मुताबिक, कंपनी को हर साल लगभग 200 करोड़ रुपए दिए गए।

उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा कि “टेंडर की शर्तों के अनुसार क्या हुआ, इसकी जांच के बाद ही कुछ कहना उचित होगा। कार्रवाई का सवाल है, तो हम देखेंगे कि शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं।”

कंपनी का दावा:
कंपनी के सीईओ पुनीत दुबे का कहना है कि उन्होंने टेंडर की शर्तों के अनुसार ही काम किया। उनका दावा है कि मध्य प्रदेश की ये लैब दुनिया के सबसे अच्छे मानकों वाली हैं और मशीनें US-FDA से मंज़ूर हैं। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने कैमरे पर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनका उद्देश्य लोगों को उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएँ देना बताया गया।

दरभिन्नता और निवेश:
जाँच में यह भी सामने आया कि सरकारी अस्पतालों में अलग-अलग जगहों पर जांच दरों में बड़ा अंतर है। उदाहरण के लिए, कुछ खास टेस्ट के लिए जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और मेडिकल कॉलेज में अलग-अलग रेट हैं। कंपनी का कहना है कि मेडिकल कॉलेजों में पहले से सुविधाएँ मौजूद थीं, इसलिए निवेश कम था, जबकि जिला अस्पतालों में नया निवेश करीब 1 करोड़ रुपए हुआ, इसलिए दरें अधिक हैं।

एनएबीएल प्रमाणन में देरी:
टेंडर के 6 साल बाद भी केवल 34 सरकारी अस्पतालों की लैब को ही एनएबीएल सर्टिफिकेट मिला है। यह दिखाता है कि पूरी प्रक्रिया में देरी हो रही है, जिससे सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार का लक्ष्य पूरा हो पा रहा है या नहीं।

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