बैगा मौतों पर दिल्ली की नजर! ST आयोग ने खोली सिस्टम की पोल?
Delhi’s Eyes on Baiga Deaths! Did the ST Commission Expose the System’s Failure?

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। बालाघाट। बैहर-बिरसा क्षेत्र में बैगा बच्चों की मौत, बीमारी, कुपोषण और पेयजल संकट को लेकर अब मामला राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली के तीन सदस्यीय जांच दल ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर जमीनी हालात का जायजा लिया। जांच दल ने स्वास्थ्य केंद्र, छात्रावासों और बैगा बस्तियों में पहुंचकर व्यवस्थाओं की पड़ताल की।
आयोग का दल वनवासी कल्याण आश्रम महाकौशल प्रांत के लखन मरावी द्वारा भेजी गई शिकायत को संज्ञान में लेने के बाद बालाघाट पहुंचा। दल में वरिष्ठ विधि सलाहकार, सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी और अन्वेषक शामिल रहे।
दौरे के दौरान आयोग के अधिकारियों ने सोनगुड्डा क्षेत्र का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों से सीधे संवाद कर स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, राशन और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति समझने का प्रयास किया।
स्वास्थ्य केंद्र में स्टाफ से एम्बुलेंस तक सवाल!
सोनगुड्डा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के निरीक्षण के दौरान जांच दल के सामने स्टाफ की कमी, एम्बुलेंस व्यवस्था और आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आने की जानकारी दी गई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस क्षेत्र में बच्चों की मौतों और संक्रामक बीमारियों को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है, वहां स्वास्थ्य केंद्र ही पर्याप्त मानव संसाधन और जरूरी सुविधाओं से जूझ रहा हो तो गंभीर मरीजों को समय पर इलाज कैसे मिलेगा?
आयोग के अधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान सामने आए तथ्यों को दर्ज किया है। अब इन कमियों की रिपोर्ट में क्या उल्लेख होता है और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
मौतों के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था जागी या आयोग की जांच ने उसकी वास्तविक तस्वीर सामने ला दी? यह सवाल अब पूरे मामले के केंद्र में है।
छात्रावासों में भी बदहाली, मूलभूत सुविधाओं पर सवाल
जांच दल ने सोनगुड्डा, गठिया, मछुरदा और सालेटेकरी स्थित जनजातीय कार्य विभाग के बालक एवं बालिका छात्रावासों का भी निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान छात्रावासों के संचालन, व्यवस्थाओं और मूलभूत सुविधाओं में कमी तथा कथित अनियमितताओं की जानकारी सामने आई है। आयोग ने इन बिंदुओं को गंभीरता से संज्ञान में लिया।
यह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आदिवासी बच्चों के लिए छात्रावास केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा, सुरक्षा, पोषण और भविष्य से जुड़ी व्यवस्था है।
यदि इन संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तो सवाल केवल स्थानीय प्रबंधन पर नहीं बल्कि निगरानी और जवाबदेही के पूरे तंत्र पर उठना स्वाभाविक है।
छह महीने का हिसाब मांगेगा आयोग, तय होगी जवाबदेही?
आयोग के वरिष्ठ विधि सलाहकार ने पत्रकारों से चर्चा में कहा कि जांच के दौरान सामने आए तथ्यों की समीक्षा के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बैहर क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की कमी है। आयोग ने विभिन्न शासकीय विभागों द्वारा किए जा रहे कार्यों से संबंधित पिछले छह महीने का डाटा प्राप्त कर उसकी समीक्षा करने की बात कही है।
अब असली परीक्षा रिपोर्ट की होगी।
स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, जनजातीय कार्य विभाग और पेयजल व्यवस्था से जुड़े रिकॉर्ड यदि एक साथ जांचे जाते हैं तो यह स्पष्ट हो सकता है कि बीमारी और मौतों के बीच सरकारी तंत्र ने वास्तव में कितना काम किया और कितना सिर्फ कागजों में दर्ज हुआ।
बैगा बच्चों की मौतों के बाद अब सवाल केवल बीमारी के कारण का नहीं है—सवाल यह भी है कि बीमारी से पहले मौजूद संकेतों, कुपोषण, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं की निगरानी में कहां-कहां चूक हुई।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की जांच से यदि जिम्मेदारी तय होती है, तो यह कार्रवाई सिर्फ एक क्षेत्र के लिए नहीं बल्कि दूरस्थ आदिवासी इलाकों में सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही के लिए बड़ा संदेश साबित हो सकती है।
Legal Disclaimer: This report is based on information provided about the Commission’s field visit and reported observations; allegations and findings remain subject to official verification and due process.