लोकतंत्र या भीड़तंत्र? रैलियों के आंकड़ों में उलझी राजनीति.
Democracy or Mobocracy? Politics Entangled in Rally Crowd Figures

विशेष संवाददाता, हरिशंकर पारासर| भोपाल | MP संवाद समाचार.
रामलीला मैदान की भीड़ पर सियासी घमासान: किसी को जनसैलाब दिखा, किसी को खाली मैदान। लेकिन जनता के असली सवालों का जवाब कौन देगा?
लोकतंत्र अब अपनी अस्सीवीं वर्षगांठ के करीब है। किसी व्यक्ति के जीवन में अस्सी वर्ष उम्र का वह पड़ाव होता है, जहाँ शरीर कमजोर पड़ने लगता है, याददाश्त धुंधली हो सकती है और अधिकारों की रक्षा के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। भारतीय लोकतंत्र भी आज कुछ ऐसा ही असहाय दिखाई देता है। उसने आज़ादी के बाद से अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन सवाल यह है कि जिस जनता के नाम पर यह व्यवस्था खड़ी हुई, क्या उसकी आवाज आज भी उतनी ही मजबूती से सुनी जा रही है?
इसी सवाल के बीच रामलीला मैदान का राजनीतिक प्रसंग चर्चा में है। कांग्रेस ने दावा किया कि मैदान में हजारों लोग उमड़े। भाजपा ने तस्वीरों और अपने नजरिए से मैदान को लगभग खाली बताया। एक पक्ष को जनसैलाब नजर आया, दूसरे को खाली जगह। जनता के सामने सवाल खड़ा हो गया—आखिर मैदान में लोग थे या भीड़ केवल राजनीतिक दावों में मौजूद थी?
वोट गिनने से भीड़ गिनने तक
भारतीय राजनीति का नया दृश्य दिलचस्प है। कभी नेता जनता के वोट गिनते थे, अब रैलियों में भीड़ गिनने लगे हैं। कभी चुनावी आंकड़ों पर बहस होती थी, अब मैदान में खड़े लोगों की संख्या पर सियासी मुकाबला चल रहा है। एक पार्टी कहती है—लाखों आए। दूसरी कहती है—हजार भी नहीं थे।
लगता है जनगणना के बाद अब राजनीतिक दलों को अपनी-अपनी ‘भीड़ गणना’ का विभाग भी खोल लेना चाहिए। वहां आंकड़े भी पार्टी के होंगे, निष्कर्ष भी पार्टी के और प्रमाण भी पार्टी के कैमरे से आएंगे।
भीड़ का अपना लोकतंत्र
भीड़ का भी अपना लोकतंत्र होता है। वहां पहचान पत्र नहीं मांगा जाता, जाति नहीं पूछी जाती और विचारधारा का प्रमाणपत्र नहीं देखा जाता। मंच से आवाज लगती है और नारे गूंजने लगते हैं। मंच पर बैठे नेता जनता की ताकत का दावा करते हैं, जबकि मंच के नीचे खड़े लोग नेताओं की ताकत बन जाते हैं।
फर्क बस इतना है कि भीड़ घर लौट जाती है और नेता अपनी-अपनी भीड़ के आंकड़े लेकर टीवी स्टूडियो पहुंच जाते हैं। फिर शुरू होता है—किसकी रैली बड़ी, किसका मैदान छोटा और किसकी तस्वीर ज्यादा प्रभावशाली?
कैमरे का कोण, राजनीति का निष्कर्ष
कांग्रेस के लिए भीड़ लोकतंत्र बचाने के अभियान का प्रमाण हो सकती है, तो भाजपा के लिए मैदान का खाली दिखना कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरी का संकेत। दोनों के अपने कैमरे हैं, अपने कोण हैं और अपने निष्कर्ष।
कैमरा किस दिशा में घुमाया गया, मैदान का कौन-सा हिस्सा दिखाया गया और कौन-सा हिस्सा फ्रेम से बाहर रहा—यह सब अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है। तस्वीरें सच दिखा सकती हैं, लेकिन एक तस्वीर अपने आप में पूरी कहानी नहीं होती। भीड़ के आकार का निष्कर्ष निकालने के लिए संदर्भ, समय, स्थान और विश्वसनीय आंकड़े भी जरूरी हैं।
चुनाव के दिन जनता, बाकी दिन भीड़?
लोकतंत्र में जनता की अहमियत चुनाव के दिन सबसे ज्यादा दिखाई देती है। उस दिन एक-एक वोट की कीमत होती है। लेकिन चुनाव के बाद वही जनता कभी भीड़ कहलाती है, कभी समर्थक, कभी कार्यकर्ता और कभी विपक्ष की भीड़।
सत्ता पक्ष की रैली हो तो उसे जनसमर्थन का सैलाब बताया जाता है। विपक्ष की रैली हो तो किराये की भीड़ का आरोप लग जाता है। विपक्ष की सभा में लोग कम हों तो संगठन कमजोर; ज्यादा हों तो भीड़ जुटाने की मशीनरी सक्रिय!
राजनीति में यह सुविधाजनक गणित है—भीड़ अपनी हो तो जनभावना, विरोधी की हो तो प्रबंधन।
भीड़ के शोर में जनता के सवाल गुम
अब राजनीतिक सफलता का नया पैमाना भीड़ बनता दिखाई देता है। किसने कितने लोग जुटाए, किस मंच पर कितने नेता बैठे, किसके नारे कितनी दूर तक सुनाई दिए और किसके ड्रोन कैमरे ने कितनी बड़ी तस्वीर दिखाई—यही चर्चा का केंद्र बन जाता है।
इस शोर में महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की परेशानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। मंच पर भाषण जारी रहता है और कैमरों के सामने भीड़ का पोस्टमॉर्टम।
क्या जनता की समस्याओं का समाधान भीड़ के आकार से तय होगा? क्या किसी मैदान में हजारों लोगों का जुटना अपने आप में जनसमर्थन का अंतिम प्रमाण है? और क्या किसी तस्वीर में खाली जगह दिख जाने से जनता की राजनीतिक चेतना का फैसला किया जा सकता है?
भीड़ जुट सकती है, विश्वास नहीं
लोकतंत्र में भीड़ जुटाना आसान हो सकता है, लेकिन जनता का विश्वास हासिल करना इतना आसान नहीं। लोग बसों से भी आ सकते हैं, संगठन के बुलावे पर भी और किसी मुद्दे के प्रति वास्तविक आक्रोश में भी उमड़ सकते हैं।
लेकिन विश्वास बसों में भरकर नहीं आता। वह मंच से घोषणा करने पर नहीं मिलता। विश्वास काम से बनता है, व्यवहार से बनता है और जनता के सवालों का जवाब देने से बनता है।
वोट चोरी के आरोपों का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। उसी तरह भीड़ के दावों को भी विश्वसनीय आंकड़ों, तस्वीरों और स्पष्ट संदर्भों के आधार पर परखा जाना चाहिए। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि मैदान भरने से ज्यादा जरूरी जनता के मन में जगह बनाना है।
जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?
अब कांग्रेस भाजपा की भीड़ गिनेगी और भाजपा कांग्रेस का मैदान नापेगी। एक दूसरे की रैलियों में खाली कुर्सियां खोजेगा, तो दूसरा ड्रोन कैमरे से भीड़ का समुद्र दिखाएगा। जनता टीवी पर यह तमाशा देखेगी और सोचती रहेगी—आखिर उसके हिस्से के सवालों का जवाब कौन देगा?
क्योंकि लोकतंत्र का असली सवाल यह नहीं है कि रामलीला मैदान में कितने लोग थे। असली सवाल यह है कि उन लोगों की आवाज सत्ता तक कितनी पहुंची और सत्ता ने उनके सवालों का जवाब कितना दिया।
बाकी भीड़ पर भिड़ंत जारी है। कोई उसे जनसैलाब बता रहा है, कोई राजनीतिक बुलबुला। लोकतंत्र किनारे खड़ा है—उसे समझ नहीं आ रहा कि वह जनता के हाथ में है या नेताओं की भीड़ के बीच कहीं खो गया है।
लोकतंत्र में भीड़ का शोर बड़ा हो सकता है, लेकिन जनता की आवाज उससे कहीं ज्यादा अहम है।
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