जनसंपर्क या जनदूरी? छोटे अखबारों से आखिर क्यों मुंह मोड़ रहा सिस्टम?
Public Relations or Public Disconnect? Why Is the System Ignoring Small Newspapers?

Special Correspondent, Rajendra Singh Jadon, Bhopal, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, भोपाल।
भोपाल। मध्यप्रदेश का जनसंपर्क विभाग शासन और जनता के बीच सूचना का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। विभाग का दायित्व केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां जारी करना नहीं, बल्कि सरकार की योजनाओं, नीतियों और उपलब्धियों को प्रदेश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना, मीडिया में प्रकाशित समाचारों की निगरानी करना तथा आवश्यक होने पर संबंधित विभागों से तथ्य जुटाकर जनसामान्य तक सही जानकारी पहुंचाना भी है।
कागजों पर विभाग की संरचना काफी मजबूत दिखाई देती है। आयुक्त, संचालक, संयुक्त संचालक, सहायक संचालक, जिला कार्यालय और विभिन्न विभागों के जनसंपर्क अधिकारी पूरी व्यवस्था का हिस्सा हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर कई पत्रकारों और छोटे समाचार पत्रों के संचालकों का अनुभव इससे अलग दिखाई देता है।
क्या बड़े मीडिया तक ही सीमित है प्राथमिकता?
प्रदेश के अनेक छोटे, मध्यम, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकारों का कहना है कि विभाग की प्राथमिकता अक्सर बड़े मीडिया समूहों तक सीमित दिखाई देती है। उनका आरोप है कि व्यापक प्रसार वाले दैनिक समाचार पत्रों और बड़े चैनलों को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि छोटे प्रकाशनों में प्रकाशित जनहित के समाचार अपेक्षित ध्यान नहीं प्राप्त कर पाते।
हालांकि विभाग की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक स्वीकारोक्ति नहीं है।
‘कटिंग सेक्शन’ की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
जनसंपर्क विभाग का एक महत्वपूर्ण कार्य प्रदेशभर में प्रकाशित समाचारों का संकलन एवं विश्लेषण करना भी माना जाता है। उद्देश्य यह है कि सरकार विभिन्न समाचारों से अवगत रहे और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विभागों से कार्रवाई या स्पष्टीकरण प्राप्त किया जा सके।
पत्रकारों के एक वर्ग का कहना है कि व्यवहारिक स्तर पर समाचारों की समीक्षा मुख्यतः बड़े दैनिक समाचार पत्रों तक सीमित रह जाती है, जबकि छोटे प्रकाशनों में प्रकाशित कई महत्वपूर्ण स्थानीय समाचार व्यापक स्तर तक नहीं पहुंच पाते।
यदि ऐसा है तो यह व्यवस्था स्थानीय समस्याओं के समय पर समाधान में भी बाधा बन सकती है।
छोटे समाचार पत्र ही उठाते हैं स्थानीय मुद्दे
ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में आज भी अनेक छोटे समाचार पत्र जनता की पहली आवाज बने हुए हैं। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार, पेयजल, राशन और पंचायत स्तर की अनेक समस्याएं सबसे पहले इन्हीं प्रकाशनों के माध्यम से सामने आती हैं।
पत्रकारिता का मूल सिद्धांत यह नहीं कहता कि किसी समाचार का महत्व उसके प्रकाशन संस्थान के आकार से तय होगा। जनहित से जुड़ी सूचना, चाहे किसी राष्ट्रीय दैनिक में प्रकाशित हो या किसी छोटे साप्ताहिक पत्र में, उसका महत्व समान होना चाहिए।
संसाधनों की कमी भी एक बड़ी चुनौती
दूसरी ओर विभागीय अधिकारियों की अपनी व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। प्रदेश के कई जिलों में लंबे समय से अधिकारी एवं कर्मचारियों के पद रिक्त हैं। कहीं संयुक्त संचालक नहीं हैं तो कहीं सहायक संचालक का पद खाली है। कई कार्यालय सीमित स्टाफ के सहारे संचालित हो रहे हैं।
ऐसी स्थिति में हजारों समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की नियमित समीक्षा करना प्रशासनिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
समस्या केवल संसाधनों की नहीं, प्राथमिकताओं की भी
यदि संसाधनों की कमी है तो उसका समाधान भी शासन स्तर पर ही खोजा जाना चाहिए। सूचना के लोकतांत्रिक प्रवाह में छोटे और बड़े मीडिया संस्थानों के बीच असमानता की धारणा स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत नहीं मानी जाती।
पत्रकारों का कहना है कि विभागीय पदानुक्रम, सीमित संसाधन और प्रशासनिक दबाव के कारण कई बार वास्तविक समस्याएं समय पर सामने नहीं आ पातीं।
मुद्दा विज्ञापन नहीं, समान सम्मान का
यह बहस केवल सरकारी विज्ञापनों की नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या प्रदेश के सभी मान्यता प्राप्त और नियमित रूप से प्रकाशित समाचार पत्रों को समान महत्व दिया जा रहा है?
यदि सरकार वास्तव में अपनी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना चाहती है, तो उसे उन छोटे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की भूमिका को भी गंभीरता से स्वीकार करना होगा, जो दूरस्थ क्षेत्रों में आज भी सूचना का सबसे विश्वसनीय माध्यम बने हुए हैं।
MP संवाद का सवाल
लोकतंत्र में संवाद जितना व्यापक होगा, शासन उतना ही जवाबदेह बनेगा। क्या अब समय नहीं आ गया है कि जनसंपर्क विभाग अपनी कार्यप्रणाली में ऐसी व्यवस्था विकसित करे, जिसमें बड़े मीडिया संस्थानों के साथ-साथ छोटे समाचार पत्रों की खबरों को भी समान गंभीरता से देखा जाए?
(नोट: यह लेख विभिन्न पत्रकारों एवं छोटे समाचार पत्रों से जुड़े लोगों द्वारा व्यक्त विचारों, अनुभवों और उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित विश्लेषणात्मक लेख है। यदि जनसंपर्क विभाग इस विषय पर अपना पक्ष या स्पष्टीकरण देना चाहता है, तो उसे भी समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)