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ई-रिक्शा में प्रसव, एम्बुलेंस गायब — मातृत्व सुरक्षा पर बड़ा सवाल.

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Childbirth in an e-rickshaw, ambulance missing — serious questions over maternal safety.

Special Correspondent, Anuj Pandey, Gwalior, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, Gwalior। जिले के भीतरवार इलाके में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का एक शर्मनाक और अमानवीय चेहरा सामने आया है। गांव में दर्द से कराहती एक प्रसूता को अस्पताल ले जाने के लिए परिजनों को एम्बुलेंस तक नसीब नहीं हुई। मजबूरी में परिवार उसे ई-रिक्शा से लेकर अस्पताल पहुंचा, लेकिन वहां भी संवेदनहीनता और लापरवाही ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। हालात ऐसे बने कि महिला को अस्पताल परिसर में खड़े ई-रिक्शा में ही बच्चे को जन्म देना पड़ा।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, Bhitarwar क्षेत्र की रहने वाली दीपा प्रजापति को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने जननी एम्बुलेंस के लिए कॉल किया, लेकिन चालक ने नेटवर्क समस्या का हवाला देकर कॉल काट दी। दर्द से तड़पती महिला के सामने समय तेजी से निकलता जा रहा था।

एम्बुलेंस का इंतजार छोड़कर परिजन ई-रिक्शा से महिला को शासकीय अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन वहां हालात और भी चौंकाने वाले निकले। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अस्पताल में न तो कोई डॉक्टर मौजूद था और न ही आवश्यक स्टाफ। जो कर्मचारी मौजूद थे, उन पर परिजनों से अभद्र व्यवहार करने का आरोप है।

स्टाफ पर बदसलूकी के गंभीर आरोप

परिजनों का कहना है कि अस्पताल में मौजूद अटेंडर और स्टाफ ने मदद करने के बजाय अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, स्टाफ ने महिला से कहा—“चुप रहो, क्यों बक-बक कर रही हो।”
इसी दौरान प्रसूता दीपा प्रजापति की हालत बिगड़ती चली गई और मजबूरन अस्पताल परिसर में खड़े ई-रिक्शा में ही प्रसव कराना पड़ा।

परिजनों ने आरोप लगाया कि डिलीवरी के समय अस्पताल में न महिला चिकित्सक थी, न ड्यूटी डॉक्टर और न ही पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ। केवल एक सिस्टर ड्यूटी पर थी, जो करीब दस मिनट बाद ई-रिक्शा तक पहुंची। तब तक स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी।

परिजनों के मुताबिक, बच्चा उल्टी स्थिति में फंसा हुआ था और किसी प्रशिक्षित डॉक्टर के बिना ई-रिक्शा में ही प्रसव कराना पड़ा। गनीमत रही कि जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।

प्रसूता के पति ने बताया कि उन्होंने 108 एम्बुलेंस सेवा पर भी कॉल किया था, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। जिस चालक से बात हुई, वह स्थानीय जननी वाहन का चालक नहीं बताया गया।

सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम

यह घटना केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलने वाली सच्चाई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

  • जब प्रसूता तड़प रही थी, तब एम्बुलेंस कहां थी?
  • अस्पताल में डॉक्टर और स्टाफ आखिर क्यों नदारद थे?
  • क्या भीतरवार जैसे इलाकों में सुरक्षित प्रसव केवल कागज़ों में ही संभव है?

ई-रिक्शा में कराई गई डिलीवरी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जमीनी हकीकत में मातृ स्वास्थ्य सेवाएं अब भी भगवान भरोसे हैं।
अब जरूरत इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की है — ताकि अगली बार कोई महिला सड़क और ई-रिक्शा के बीच जिंदगी की जंग लड़ने को मजबूर न हो।

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