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अफसर–डेवलपर गठजोड़ का खेल? 17 जिलों में जमीन घोटाले के आरोप.

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Alleged land scam involving officers and private developers in Madhya Pradesh redevelopment projects

17 जिलों में सरकारी जमीन निजी डेवलपर्स को सौंपे जाने के आरोप, विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल।

Officers–Developers Nexus at Play? Allegations of a Land Scam Across 17 Districts.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, भोपाल। मध्य प्रदेश में रीडेंसिफिकेशन (रीडेवलपमेंट) योजना अब विकास नहीं, बल्कि सरकारी जमीनों की कथित खुली डकैती के आरोपों के चलते विपक्ष के तीखे निशाने पर आ गई है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस योजना को अफसर–डेवलपर गठजोड़ का सुनियोजित घोटाला करार देते हुए हजारों करोड़ रुपये की सरकारी संपत्ति को औने-पौने दामों पर निजी हाथों में सौंपने का गंभीर आरोप लगाया है।

योजना या घोटाले की पटकथा?

वर्ष 2018 में शुरू हुई रीडेंसिफिकेशन नीति का घोषित उद्देश्य पुरानी, जर्जर और अनुपयोगी सरकारी जमीनों का बेहतर उपयोग था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इस नीति को भ्रष्टाचार का हथियार बना दिया गया।
सरकारी जमीनों को ‘खाली’ या ‘अनुपयोगी’ घोषित कर बाजार मूल्य से 5 से 10 गुना कम कीमत पर निजी डेवलपर्स को सौंपा गया। बदले में सरकार को नाममात्र की राशि, जबकि डेवलपर्स ने लक्ज़री फ्लैट्स, मॉल और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स बनाकर अरबों का मुनाफा कमाया।

“सरकारी जमीन की खुली डकैती” – कांग्रेस का आरोप

कांग्रेस नेता हेमंत कटारे, उमंग सिंघार समेत कई नेताओं ने आरोप लगाया कि
6000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की सरकारी जमीनें योजना में शामिल की गईं
सरकार को मिले सिर्फ 1000 करोड़ रुपये के आसपास
बाकी रकम डेवलपर्स की जेब में गई

इसे विपक्ष ने “जनता की संपत्ति की संगठित लूट” बताया है।

प्रमुख उदाहरण जो सवाल खड़े करते हैं

रीवा जिला

  • 4 प्रोजेक्ट्स में 20 एकड़ से अधिक जमीन
  • सरकारी मूल्यांकन: 1450 करोड़
  • सरकार को मिले: 450 करोड़
  • डेवलपर्स की कमाई: 3500 करोड़ से ज्यादा

बैतूल जिला

  • प्रोजेक्ट लागत: 60 करोड़
  • जमीन का वास्तविक मूल्य: 600 करोड़
  • सरकार को भुगतान: सिर्फ 60 करोड़

ऐसे ही मामलों में मूल्यांकन जानबूझकर बेहद कम दिखाने के आरोप सामने आए हैं।

17 जिलों में फैला कथित घोटाला

आरोपों के अनुसार यह खेल प्रदेश के इन जिलों में चला—
रीवा, बैतूल, सतना, सीधी, बालाघाट, मंडला, छिंदवाड़ा, गुना, विदिशा, भोपाल, बुरहानपुर, सागर, उज्जैन, देवास, शाजापुर, रतलाम और मुरैना।
हालांकि सरकार की ओर से आधिकारिक सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

उठ रहे गंभीर सवाल

  • सरकारी जमीनों का मूल्यांकन इतना कम कैसे किया गया?
  • जमीन आवंटन करने वाले अफसरों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
  • कलेक्टर स्तर पर गाइडलाइंस की अनदेखी कैसे हुई?
  • जिन जमीनों को ‘खाली’ बताया गया, वहां निर्माण कैसे हो गया?
  • क्या मुख्यमंत्री स्तर पर इस योजना की कभी समीक्षा हुई?

SIT और लोकायुक्त जांच की मांग

कांग्रेस विधायक अमरिया मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा—

“यह योजना जनता की संपत्ति की लूट है। सरकार तत्काल इसे बंद करे और लोकायुक्त या SIT से निष्पक्ष जांच कराए, वरना जनता सड़कों पर उतरेगी।”

सरकार का पक्ष: चुप्पी क्यों?

अब तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। सूत्रों का दावा है कि कुछ प्रकरणों में विभागीय जांच चल रही है, लेकिन व्यापक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही।

जमीन घोटालों की लंबी सूची में नया अध्यायरीडेंसिफिकेशन विवाद ने मध्य प्रदेश में जमीन घोटालों की लंबी फेहरिस्त में एक और गंभीर अध्याय जोड़ दिया है।अब सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और जवाबदेही का है।प्रदेश की जनता की निगाहें अब जांच और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

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