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अधिमान्यता या आज्ञाकारिता? MP में सवालों पर सजा.

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Madhya Pradesh journalist accreditation controversy and press freedom debate

एमपी में पत्रकारों की अधिमान्यता प्रक्रिया पर उठते गंभीर सवाल।

Accreditation or Obedience? Punishment for Asking Questions in Madhya Pradesh.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Bhopal, MP Samwad News.

MP संवाद, भोपाल — मध्यप्रदेश में पत्रकारिता अब सवाल पूछने से नहीं, सिस्टम में फिट बैठने से तय हो रही है। जनसंपर्क विभाग की अधिमान्यता सूची इस बात का प्रमाण बन चुकी है कि पत्रकार वही है, जिसे सत्ता की स्वीकृति प्राप्त हो।

जिन पत्रकारों ने वर्षों तक सड़क, अस्पताल, थाने और गांवों की खाक छानी—वे आज भी अधिमान्यता की फाइलों में दबे हैं। वहीं, जिनके पास राजनीतिक पहुंच है, उनके नाम हर साल सूची में जस के तस बने रहते हैं।

कलम की धार नहीं, पहुंच की पहचान

नियम कहते हैं—अनुभव चाहिए।
हकीकत कहती है—सिफारिश चाहिए।

जिला स्तर पर समितियां वर्षों से निष्क्रिय हैं। बालाघाट, सिवनी जैसे जिलों में पत्रकार अधिमान्यता के लिए भटक रहे हैं, जबकि राजधानी केंद्रित पत्रकारों की सूची हर साल लंबी होती जा रही है।

जो सवाल पूछे, वही अपराधी

गुना में मंत्री से सवाल पूछने वाला पत्रकार 11 एफआईआर झेलता है।
इंदौर में दूषित पानी पर सवाल उठाने वाला पत्रकार सार्वजनिक अपमान का शिकार होता है।
संदेश साफ है—सवाल करोगे, तो सजा मिलेगी।

उपहार संस्कृति और गिरती नैतिकता

सरकारी आयोजनों में गिफ्ट बैग्स को लेकर मचा हंगामा पत्रकारिता की गिरती साख को उजागर करता है। जब खबर से ज्यादा उपहार की चिंता हो, तो सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?

क्या बिना अधिमान्यता पत्रकार नहीं?

अधिमान्यता अब सुविधा नहीं, नियंत्रण का औजार बनती जा रही है।
स्वास्थ्य बीमा, आवास, पहचान—सब उसी के हिस्से, जो ‘सूची’ में है।

अब चुप्पी नहीं, संघर्ष जरूरी

यदि फील्ड पत्रकारों को उनका हक नहीं मिला, तो पत्रकारिता सत्ता का प्रचार तंत्र बनकर रह जाएगी।
सरकार को समितियां सक्रिय करनी होंगी, नहीं तो अधिमान्यता एक राजनीतिक पासपोर्ट बनकर रह जाएगी।

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