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आंखों पर भरोसा या सिस्टम पर? अजीब दुविधा.

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Trust your eyes or the system? A strange dilemma.

Special Correspondent, Satyadev Chaturvedi, MP Samwad News.

MP संवाद समाचार, आज मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ पेट्रोल लेने के लिए कुछ फ्यूल स्टेशनों पर गया… और सभी बंद मिले।

पहली नजर में लगा कि पंप सचमुच बंद हैं।
लेकिन तभी मेरे भीतर का “जागरूक नागरिक” जागा और बोला—
“रुको! जो तुम देख रहे हो, वह सच भी हो सकता है… और अफवाह भी!”

मुझे तो रोज यही समझाया जाता है—शासन कहता है, मीडिया बताता है—
कि देश में सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है।
इसलिए जो दिखे, उस पर नहीं… जो बताया जाए, उसी पर विश्वास करो।

बस फिर क्या था…
मैंने अपनी आंखों को ही झूठा ठहरा दिया…
और बंद पड़े पेट्रोल पंप को एक “साजिश” घोषित कर दिया।

मैंने खुद से कहा—
“ये जरूर विपक्ष का षड्यंत्र होगा! CGI तकनीक से यह दृश्य रचा गया है, ताकि जनता को भ्रमित किया जा सके।”

आखिर अगर पंप सच में बंद होते,
तो शासन क्यों नहीं बताता?
मीडिया क्यों नहीं दिखाता?

और जब कहा जा रहा है कि सब ठीक है…
तो सब ठीक ही है—चाहे जमीन पर कुछ भी दिखे।

मैंने वहीं खड़े-खड़े अपना “नागरिक कर्तव्य” निभाया—
न कोई सवाल पूछा, न कोई संदेह किया।
व्यवस्था पर भरोसा किया… और गर्व महसूस किया।

अब मैं घर लौट आया हूं…
और इंतजार कर रहा हूं उस दिन का—
जब मुझे भी “अफवाहों से लड़ने वाला योद्धा” का सम्मान मिलेगा।

क्योंकि आज के समय में…
सच देख लेना आसान है…
लेकिन उसे झुठलाकर भी विश्वास बनाए रखना—यही असली परीक्षा है।

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