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आधुनिकता बन गई रोज़ी-रोटी की दुश्मन! खस टटिया कारीगर बेहाल.

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Khus mat artisans in Katni face fading demand as plastic coolers and air conditioners dominate the summer market.

Traditional khus mat artisan sitting beside unsold mats on a street in Katni during summer season.

Traditional khus mat makers in Katni await buyers amid declining demand due to rising use of ACs and plastic coolers.

Modernity Turns Enemy of Livelihood! Khus Mat Artisans in Distress.

Mohan Nayak, Special Correspondent, Katni, MP Samwad.

एसी और प्लास्टिक कूलर के बढ़ते चलन ने खस टटिया कारीगरों की रोज़ी-रोटी पर संकट ला दिया है। कभी गर्मी के मौसम की जान माने जाने वाले ये कारीगर आज बेरोज़गारी और घटती मांग से जूझ रहे हैं। परंपरागत हुनर आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूट गया है।

MP संवाद, कटनी — गर्मी के मौसम का इंतज़ार करने वाले खस की टटिया बनाने वाले कारीगरों के लिए अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। कटनी जिले से हर साल दूसरे जिलों में व्यापार के लिए जाने वाले इन कारीगरों की रोज़ी-रोटी पर अब आधुनिकता की मार पड़ रही है। एसी और प्लास्टिक बॉडी कूलरों की बढ़ती मांग ने खस की टटिया के व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

कटनी शहर के कोतवाली तिराहे सहित अन्य स्थानों पर हर साल की तरह इस बार भी खस की टटिया की दुकानें सजी हैं, लेकिन खरीदारों का अभाव साफ देखा जा सकता है। तेज़ गर्मी में भी सड़क किनारे तपती धूप में ग्राहक के इंतजार में बैठे कारीगरों की उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं।

इस बार सिर्फ 4 परिवार बाहर गए:
खस के कारोबारी सुरेश बेन बताते हैं कि पहले दर्जनों परिवार व्यापार के लिए बाहर जाया करते थे, लेकिन इस बार सिर्फ 4 परिवार ही अन्य जिलों में गए हैं। खपत में गिरावट के कारण अब वे कम मात्रा में खस और अन्य सामग्री लेकर जा रहे हैं।

खिड़की और दरवाजे में भी लगती थी खस की टटिया:
कारीगर महेश बेन ने बताया कि कुछ साल पहले तक खस की टटिया के अलावा खिड़कियों और दरवाजों के लिए भी पर्दे बनवाए जाते थे। सरकारी कार्यालयों में भी खस के पर्दे लगाए जाते थे। आज यह मांग लगभग समाप्त हो गई है।

खपत घटने के कारण:
लोहे के कूलरों में समय के साथ जंग लगने और करंट का खतरा बढ़ने के कारण अब लोग प्लास्टिक बॉडी कूलरों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह हल्के होने के कारण आसान से एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जा सकते हैं, जिससे लोहे के कूलर और खस की टटिया का व्यापार प्रभावित हुआ है।

कोतवाली तिराहे में सजा बाजार:
विक्रेता राजू बेन का कहना है कि अब एसी और प्लास्टिक कूलरों का ज़्यादा उपयोग हो रहा है। जल्द ही खस की टटिया का यह कारोबार पूरी तरह से खत्म हो सकता है।

कारीगर छोटेलाल बेन ने बताया कि इस कारोबार के लिए वे लोग सर्दियों से ही तैयारी शुरू कर देते हैं, लेकिन अब मांग पहले जैसी नहीं रही।

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