₹98 का प्रावधान, ₹33 का खाना! कटनी अस्पताल में भोजन ‘घोटाले’ के सवाल.
₹98 Approved, ₹33 Served! Questions Rise Over Food ‘Scam’ at Katni Hospital.
Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.
MP संवाद, कटनी। मध्य प्रदेश के कटनी जिला अस्पताल में भर्ती मरीजों को मिलने वाला भोजन अब सेवा नहीं, सजा बनता जा रहा है। सरकारी नियमों और मानकों के बावजूद भोजन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। ठेका प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव, बेहद कम दर पर ठेका आवंटन और गुणवत्ता की खुली अनदेखी से सैकड़ों मरीजों की सेहत से सीधा खिलवाड़ किया जा रहा है।
200–300 बेड, लेकिन थाली में नाममात्र का भोजन
कटनी जिला अस्पताल की बेड क्षमता लगभग 200 से 300 है और प्रतिदिन औसतन 150 से 250 मरीज भर्ती रहते हैं। इन मरीजों के भोजन की जिम्मेदारी रोगी कल्याण समिति (RKS) के माध्यम से ठेकेदार को दी जाती है।
राज्य सरकार द्वारा अधिकतम ₹98 प्रति मरीज प्रतिदिन का प्रावधान है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ठेका प्रक्रिया में दर ₹60 या उससे भी कम पर सिमट जाती है।
नतीजा साफ है—
नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन मिलाकर भी ICMR के 2000–2600 कैलोरी मानक पूरे नहीं होते। मरीजों को पतली दाल, बेस्वाद सब्जी और बेहद कम मात्रा में भोजन परोसा जा रहा है।
ठेका किसे मिला? दर क्या है?—रिकॉर्ड ही गायब
सूत्रों के अनुसार, कटनी जिला अस्पताल में भोजन ठेके से जुड़ा कोई स्पष्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
न ठेकेदार कंपनी का नाम,
न उसकी लोकेशन,
न ठेके की अवधि,
और न ही स्वीकृत दर—
कुछ भी जिला वेबसाइट या टेंडर पोर्टल पर सार्वजनिक नहीं किया गया।
यह पारदर्शिता की घोर कमी अस्पताल प्रबंधन की गंभीर लापरवाही और संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
भोपाल से कटनी तक—एक जैसा खेल?
राज्य के अन्य अस्पतालों, जैसे भोपाल के जेपी अस्पताल, में भोजन ठेका बाहरी (कोलकाता स्थित) कंपनियों को दिए जाने के आरोप पहले से सामने आ चुके हैं। वहां शिकायतें रही हैं कि
- बर्तन नहीं दिए जाते
- भोजन मात्रा में कम होता है
- शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती
कटनी में भी स्थिति कुछ अलग नहीं दिखती, क्योंकि अब तक न कोई ठोस शिकायत दर्ज हुई, न कोई कार्रवाई सामने आई—जो प्रशासनिक अनदेखी या मिलीभगत की आशंका को और मजबूत करती है।
मरीज का खाना—कैदी और गाय से भी सस्ता!
मध्य प्रदेश में मरीजों के भोजन पर होने वाला खर्च पड़ोसी राज्यों से बेहद कम है—
- राजस्थान: ₹70
- छत्तीसगढ़: ₹150
- उत्तर प्रदेश: ₹116
- मध्य प्रदेश: ₹48–₹98 (2014 से अब तक लगभग अपरिवर्तित)
हैरानी की बात यह है कि कई जगह वास्तविक खर्च ₹33 तक सिमट जाता है—
जो
- जेल कैदियों (₹70–75)
- और गौशालाओं की गायों (₹40+)
से भी कम है।
सवाल साफ है—क्या बीमार मरीजों का पोषण कैदियों और पशुओं से भी कम महत्वपूर्ण है?
जिम्मेदार कौन? अधीक्षक और सिविल सर्जन चुप क्यों?
अस्पताल अधीक्षक और सिविल सर्जन की जिम्मेदारी होती है कि वे भोजन की गुणवत्ता की नियमित जांच करें। लेकिन कटनी जिला अस्पताल में ऐसी कोई सक्रिय निगरानी नजर नहीं आती।
मरीजों और परिजनों के अनुसार—
- कई बार भोजन समय पर नहीं पहुंचता
- मात्रा बेहद कम होती है
- विशेष डाइट (डायबिटिक, प्रसूता महिलाओं के लिए) अनियमित या गायब रहती है
प्रशासन से सीधे सवाल
- भोजन ठेका किस कंपनी को दिया गया?
- ठेके की दर और अवधि क्या है?
- गुणवत्ता जांच क्यों नहीं हो रही?
- कम दर पर ठेका देकर मरीजों की जान जोखिम में क्यों डाली जा रही है?
यह सिर्फ कटनी नहीं, पूरे सिस्टम की तस्वीर
कटनी जिला अस्पताल की यह स्थिति केवल एक अस्पताल की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है।
सरकार को तत्काल—
- भोजन दरों में यथार्थवादी बढ़ोतरी
- ठेका प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने
- और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई
करनी चाहिए।
मरीज इलाज के लिए अस्पताल आते हैं—भूखे रहने के लिए नहीं।
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