आंकड़ों की चमक में दबा शिक्षा का अधिकार, बच्चों ने कलेक्ट्रेट में खोली हकीकत.
The Right to Education Buried Under the Glitter of Statistics: Children Exposed the Ground Reality at the Collectorate.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, कटनी। कटनी जिले की जनसुनवाई में मंगलवार को एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने विकास के तमाम दावों की चमक फीकी कर दी। ग्राम चरगवा, थाना स्लीमनाबाद के छात्र-छात्राएं अपने अभिभावकों के साथ अतिरिक्त कलेक्टर के समक्ष पहुंचे। बच्चों ने अपने खाली स्कूल बैग सौंपते हुए मार्मिक सवाल किया—“सर, हमें हमारा स्कूल कब मिलेगा?”
यह सवाल केवल कुछ बच्चों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सीधा प्रहार है जो दशकों से विकास के दावे करती रही है, लेकिन गांवों में आज भी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं करा सकी।
माध्यमिक स्कूल तक सीमित शिक्षा, हाई स्कूल के लिए 8 किलोमीटर की दूरी
ग्रामीणों ने ज्ञापन में बताया कि चरगवा जैसे बड़े ग्राम क्षेत्र में केवल माध्यमिक स्तर तक ही विद्यालय संचालित है। कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों को पढ़ाई के लिए घुघर, देवरी और कोडिया जैसे गांवों में लगभग 8 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
परिवहन, गरीबी और सुरक्षा की चिंता से टूटते सपने
परिवहन सुविधाओं का अभाव, आर्थिक तंगी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा पर गंभीर असर डाला है। कई छात्र-छात्राएं बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
ग्रामीणों ने मांग की कि गांव में तत्काल शासकीय हाई स्कूल स्वीकृत किया जाए और आगामी शैक्षणिक सत्र से कक्षाएं प्रारंभ कराई जाएं। साथ ही भवन, शिक्षक, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं।
विकास के दावों पर बच्चों का सीधा सवाल
जब देश में आधुनिक विकास, बुनियादी ढांचे और शिक्षा विस्तार के दावे किए जा रहे हैं, तब यदि ग्रामीण बच्चों को अपने स्कूल के लिए ज्ञापन देना पड़े, तो यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
खाली बैगों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे इन बच्चों ने आंकड़ों और भाषणों से परे जमीनी हकीकत को सामने ला दिया।
“आंकड़ों की गीता” बनाम जमीनी सच
जनसुनवाई में उपस्थित लोगों के मन में एक ही प्रश्न गूंजता रहा—क्या विकास केवल आंकड़ों और भाषणों तक सीमित है?
मंचों से प्रगति के अध्याय पढ़े जाते हैं, योजनाओं की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं, लेकिन जब बच्चों को अपने शिक्षा अधिकार के लिए प्रशासनिक दफ्तरों की चौखट पर दस्तक देनी पड़े, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
बेटियों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित
गांव से दूर स्कूल होने के कारण कई परिवार अपनी बेटियों को आगे पढ़ाने में असमर्थ हैं। सुरक्षा और यातायात की कमी के चलते बालिकाओं की शिक्षा सबसे अधिक प्रभावित हो रही है।
प्रशासन के सामने मासूमों की सीधी मांग
- ग्राम चरगवा में तत्काल शासकीय हाई स्कूल की स्वीकृति
- आगामी सत्र से कक्षा 9वीं और 10वीं की शुरुआत
- पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति
- भवन, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं
बड़ा सवाल
जब बच्चों को किताबों की जगह खाली बैग लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचना पड़े, तो यह केवल एक मांग नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए आईना है। शिक्षा अधिकार है, उपकार नहीं। अब देखना यह है कि प्रशासन इन मासूम आवाजों को सुनता है या यह खाली बैग भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएंगे।