कालीमूंछ चावल का काला सच! बालाघाट में रसायन से बन रही नकली खुशबू.
The Dark Truth of Kalimooch Rice! Fake Aroma Being Created with Chemicals in Balaghat.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट। बालाघाट प्रदेश का प्रमुख धान उत्पादक जिला है, जहां सामान्य प्रजातियों के साथ-साथ खुशबूदार धान की भी बड़े पैमाने पर पैदावार होती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में करीब 6000 हेक्टेयर क्षेत्र में सुगंधित चिन्नौर धान का उत्पादन किया जा रहा है, जबकि अन्य सुगंधित किस्मों में शामिल कालीमूंछ धान केवल लगभग 300 हेक्टेयर क्षेत्र में ही दर्ज है।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आती है। कालीमूंछ धान की खेती का कोई ठोस रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। जिले के किस गांव में किस किसान ने कितने क्षेत्र में यह फसल लगाई, इसका स्पष्ट डेटा प्रशासन के पास नहीं है।
बाहर से मंगाया चावल, रसायन से बनाई खुशबू
इन्हीं विसंगतियों का फायदा उठाते हुए जिले के कुछ राइस मिलर्स ने कथित तौर पर बिहार, उत्तरप्रदेश और कर्नाटक से कालीमूंछ जैसे दिखने वाले चावल मंगाए। इसके बाद इन चावलों में प्रोपिलीन ग्लाइकोल (Propylene Glycol) जैसे रसायन मिलाकर कृत्रिम सुगंध पैदा की गई और उसे “कालीमूंछ चावल” के नाम से बाजार में बेच दिया गया।
यह चावल न केवल जिले और प्रदेश के बाजारों में पहुंचा, बल्कि देश के कई राज्यों और खाड़ी देशों तक निर्यात होने की भी चर्चा है।
वर्षों से शिकायत, लेकिन कार्रवाई शून्य
इस पूरे मामले की शिकायत पिछले कई वर्षों से जिला प्रशासन तक पहुंचाई जाती रही, लेकिन हर बार जांच के नाम पर सिर्फ औपचारिकता पूरी कर मामले की लीपापोती कर दी गई।
हाल ही में जब मीडिया में नकली कालीमूंछ चावल बनाने का मामला उजागर हुआ, तो राइस मिलर्स के बीच हड़कंप मच गया। कारण यह है कि चावल में जहरीले रसायनों से कृत्रिम सुगंध तैयार करने की प्रक्रिया ने पूरे कारोबार को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
प्रशासन और मिलावटखोरों की सांठगांठ पर सवाल
जिले में मिलावटखोरी अब लाइलाज बीमारी बन चुकी है। मिलावटखोरों को न तो कानून का डर है और न ही कार्रवाई की परवाह।
आरोप यह भी हैं कि कुछ राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, खाद्य विभाग और खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण के अधिकारियों का संरक्षण मिलने के कारण आज तक इस मामले में ठोस जांच नहीं हो सकी।
स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़
चावल में इस तरह की मिलावट केवल उपभोक्ताओं को धोखा देने का मामला नहीं है, बल्कि लोगों की सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे रसायनों के सेवन से
- किडनी और लीवर से जुड़ी बीमारियां
- पाचन तंत्र की गंभीर समस्याएं
- अन्य दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम
उत्पन्न हो सकते हैं।
कानून में सख्त प्रावधान
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के अधिनियम 2006 के अनुसार खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से छेड़छाड़ करने पर सख्त दंड का प्रावधान है।
- धारा 50 और 51 के तहत गुणवत्ता में गड़बड़ी पाए जाने पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
- यदि किसी उपभोक्ता को उसकी मांग के अनुरूप खाद्य पदार्थ न दिया जाए, तो दोषी व्यापारी या निर्माता पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
जांच हो तो खुल जाएगा पूरा खेल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जिले के उन राइस मिलर्स से पिछले तीन वर्षों का रिकॉर्ड मांगा जाए, जो कालीमूंछ चावल को विभिन्न ब्रांड नामों से बेच रहे हैं, तो सच्चाई सामने आ सकती है।
- कालीमूंछ धान की खरीदी
- चावल उत्पादन की मात्रा
- बाजार में बिक्री का आंकड़ा
इनकी जांच होते ही नकली सुगंधित चावल का पूरा नेटवर्क उजागर हो सकता है।
यदि प्रशासन इस दिशा में गंभीर जांच करता है तो उपभोक्ताओं के साथ हो रही धोखाधड़ी पर रोक लगेगी और मिलावटखोरों पर कड़ी कार्रवाई का रास्ता भी साफ होगा।