गिनती बढ़ी, सुरक्षा घटी! आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे सच्चाई.
Count Rises, Safety Falls! The Numbers Are Screaming the Truth.
Special Correspondent, Bhopal, MP Samwad.
Despite implementing the Police Commissionerate system in Indore and Bhopal, crime statistics reveal a surge in thefts, vehicle thefts, assaults, and atrocities. The shocking numbers raise serious concerns about urban policing, public safety, and the effectiveness of administrative reforms aimed at reducing crime.
MP संवाद, इंदौर और भोपाल में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू किए जाने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अपराधों पर कड़ा नियंत्रण होगा और पुलिस की कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी होगी। लेकिन विधानसभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़े इस दावे को कमजोर करते हैं। कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बावजूद दोनों शहरों में चोरी, वाहन चोरी, लूट, हत्या, महिलाओं और अनुसूचित जाति-जनजाति पर अत्याचार जैसे गंभीर अपराधों की संख्या लगातार बनी हुई है और कई मामलों में वृद्धि भी देखी गई है।
गौरतलब है कि प्रदेश के दोनों प्रमुख शहरों—इंदौर और भोपाल—में 9 दिसंबर 2021 को पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू किया गया था, ताकि अपराध पर नकेल कसी जा सके और शहरी सुरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाया जा सके। लेकिन 9 दिसंबर 2021 से 12 जुलाई 2025 के बीच दर्ज मामलों ने चौंका देने वाला सच सामने लाया है।
इंदौर की स्थिति:
- चोरी: 3061 मामले दर्ज
- वाहन चोरी: 11,567 प्रकरण
- लूट: 532 मामले
- हत्या: 308 केस
- महिलाओं पर अत्याचार: 5045 केस
- एससी/एसटी पर अत्याचार: 409 मामले
इंदौर, जो प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी माना जाता है, वहां इतने अधिक अपराधों का दर्ज होना इस बात की ओर संकेत करता है कि कानून व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है। विशेष रूप से महिलाओं और कमजोर वर्गों पर अत्याचार के आंकड़े चिंताजनक हैं।
भोपाल की स्थिति:
- चोरी: 2378 मामले
- वाहन चोरी: 5654 प्रकरण
- लूट: 191 केस
- हत्या: 158 केस
- महिलाओं पर अत्याचार: 8664 प्रकरण
- एससी/एसटी पर अत्याचार: 356 केस
राजधानी भोपाल में महिलाओं पर अत्याचार के मामले इंदौर से भी अधिक हैं, जो समाज की सुरक्षा और जागरूकता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। भोपाल में वाहन चोरी के मामलों की संख्या भी उल्लेखनीय है, जिससे पता चलता है कि अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
क्या कमिश्नर प्रणाली विफल रही?
इन आंकड़ों को देखकर यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस कमिश्नर प्रणाली से वास्तविक सुधार हुआ? अपराधों की संख्या में गिरावट के बजाय लगातार मामलों का दर्ज होना इस प्रणाली की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या आवश्यक संसाधनों की कमी, स्टाफ की कमी या सिस्टम में पारदर्शिता की कमी इसके पीछे जिम्मेदार है?