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छत टूट रही, सलाखें बाहर! बालाघाट में पढ़ाई बनी खतरा.

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Cracked roof and exposed rods in Balaghat's Kotbir Kona primary school, children forced to study in unsafe conditions

Roof Crumbling, Rods Exposed! Education Turns into Danger in Balaghat.

Sharad Dhaneshwar, Special Correspondent, Balaghat, MP Samwad.

In Balaghat’s tribal village Kotbir Kona, a crumbling school building endangers the lives of 27 students. Exposed rods, cracked walls, and falling plaster have forced classes to shift to an anganwadi center. Despite repeated complaints, no action has been taken. How many warnings before the administration wakes up?

MP संवाद, बालाघाट। मध्यप्रदेश के दूरस्थ आदिवासी अंचलों में अब भी हालात नहीं सुधरे हैं। बालाघाट जिले की बैहर तहसील की जनपद पंचायत बिरसा अंतर्गत ग्राम पंचायत घुम्मुर के कोटबीरकोना गांव की प्राथमिक शाला इसकी एक ज्वलंत मिसाल है, जहां बच्चे रोज़ मौत के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

इस स्कूल की हालत इतनी जर्जर है कि छत का प्लास्टर लगातार झड़ रहा है, और लोहे की सरिए बाहर झांक रही हैं। दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं और पूरी इमारत किसी भी समय ढह सकती है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शिक्षकों और ग्रामीणों ने बच्चों को आंगनवाड़ी भवन में स्थानांतरित कर पढ़ाना शुरू कर दिया है, क्योंकि मूल विद्यालय भवन में पढ़ाना अब सीधी जान जोखिम में डालने जैसा है।

स्कूल में कुल 27 छात्र पंजीकृत हैं। गांव बैगा जनजाति बहुल है, और राजस्व ग्राम होने के बावजूद अब तक मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। ग्राम पंचायत के सरपंच जयपाल सिंह तिलगाम ने बताया कि पिछले पाँच वर्षों से स्कूल भवन की मरम्मत और नए भवन की स्वीकृति के लिए कई बार आवेदन दिए जा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि कई बार शिक्षा विभाग, पंचायत और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। अब बच्चों को आंगनवाड़ी भवन में ठूंसकर पढ़ाया जा रहा है।

राजस्थान में हुई हालिया दुर्घटना ने देशभर में चिंता पैदा की है, जिसके बाद केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को स्कूल भवनों की स्थिति पर सख्त निर्देश जारी किए हैं। अब देखना यह है कि क्या बालाघाट जिला प्रशासन और मप्र का शिक्षा विभाग कोटबीरकोना जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर ध्यान देंगे, या फिर यहां भी किसी अनहोनी का इंतजार किया जाएगा?

सरकारी स्कूलों की बदहाली और प्रशासनिक उदासीनता आदिवासी अंचलों के बच्चों को गंभीर खतरे में डाल रही है। यदि अब भी त्वरित कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाला कल किसी और परिवार के लिए मातम बन सकता है।

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