बुखार, दाने और तेज दर्द… आखिर बैगा गांवों में बच्चों को क्या हुआ? 3 मौतों से मचा हड़कंप.
Fever, Rashes and Severe Pain… What’s Happening to Children in Baiga Villages? 3 Deaths Trigger Panic.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। बालाघाट जिले की बैहर और बिरसा तहसील के बैगा बाहुल्य गांवों में पिछले 20-25 दिनों से बच्चों में बीमारी के मामले सामने आने से चिंता बढ़ गई है। प्रभावित बच्चों में तेज बुखार, शरीर पर दाने-चकत्ते और तेज दर्द जैसे लक्षण बताए जा रहे हैं। कई गांवों से बच्चों को उपचार के लिए जिला अस्पताल लाया गया है।
स्वास्थ्य विभाग ने बीमारी के प्रकोप के बीच तीन बच्चों की मौत की पुष्टि की है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर इससे अधिक बच्चों की मौत के दावे भी सामने आए हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में बीमारी के वास्तविक कारण और मृत्यु के आंकड़ों को लेकर स्वास्थ्य विभाग की विस्तृत जांच बेहद जरूरी हो गई है।
20-25 दिनों से बीमारी का प्रकोप, जिला अस्पताल में बच्चों का इलाज जारी
जानकारी के अनुसार, बैहर-बिरसा क्षेत्र के बोदारी, मछुरदा, लिम्होटी और जाल्दा सहित कई गांवों से बीमार बच्चों को जिला अस्पताल लाया गया है। फिलहाल करीब 10-15 बच्चों के उपचार की जानकारी सामने आई है।
अस्पताल में भर्ती बच्चों के परिजनों के अनुसार, बीमारी की शुरुआत तेज बुखार और शरीर में दर्द से होती है। इसके बाद शरीर पर दाने और चकत्ते उभरने लगते हैं। हालांकि, इन लक्षणों के पीछे वास्तविक बीमारी क्या है, इसका स्पष्ट कारण स्वास्थ्य विभाग की जांच और चिकित्सकीय परीक्षण के बाद ही सामने आएगा।
ग्राम बोदारी निवासी चैन सिंह मरकाम के अनुसार, उनके चार वर्षीय बेटे सचिन की तबीयत बिगड़ने पर तत्काल उपचार की सुविधा नहीं मिल सकी। इसके बाद वे निजी वाहन से बच्चे को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसकी हालत गंभीर बताई गई।
लिम्होटी निवासी चैतू सिंह धुर्वे के चार वर्षीय बेटे जीतू का पिछले पांच दिनों से अस्पताल में उपचार चल रहा है और उसकी हालत में सुधार बताया गया है। इसी गांव की छह वर्षीय दामिनी की हालत में सुधार होने के बाद उसे अस्पताल से घर ले जाया गया।
मछुरदा निवासी मंगली बाई के छह वर्षीय बेटे शिवराज का भी अस्पताल में उपचार जारी है।
वहीं, जाल्दा निवासी जगनू मरकाम अपने तीन बच्चों—नौ वर्षीय अंजली, तीन वर्षीय वारसा और छह वर्षीय अनुराज—को 23 जुलाई को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उनका उपचार किया जा रहा है।
बीमारी से ज्यादा खतरनाक अंधविश्वास और इलाज तक पहुंच की चुनौती?
प्रभावित बैगा बाहुल्य क्षेत्रों में बीमारी के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच का सवाल भी गंभीरता से सामने आ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ परिवार बीमारी को दैविक प्रकोप मानकर झाड़-फूंक और अन्य पारंपरिक उपायों का सहारा ले रहे हैं।
ऐसे हालात में स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी की पहचान और इलाज नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों को समय पर चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराना भी है।
स्थानीय स्तर पर एम्बुलेंस और परिवहन की पर्याप्त सुविधा नहीं होने की शिकायतें भी सामने आई हैं। यदि किसी बच्चे की हालत गंभीर हो जाए तो उसे तत्काल अस्पताल पहुंचाना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में दूरस्थ बैगा गांवों में समय पर एम्बुलेंस और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता जीवनरक्षक साबित हो सकती है।
स्वास्थ्य विभाग को प्रभावित गांवों में लगातार मेडिकल कैंप लगाने के साथ-साथ लोगों को बीमारी के लक्षण, बचाव और समय पर अस्पताल पहुंचने के संबंध में जागरूक करना भी जरूरी होगा।
3 मौतों की सरकारी पुष्टि, स्थानीय दावे इससे ज्यादा—अब हर गांव की जांच जरूरी
बताया जा रहा है कि बैहर और बिरसा तहसील के मछुरदा, जाल्दा, मातला, कुडेकसा, बोदारी, लिम्होटी, कचिया, कठिया, गठिया, धर्मशाला, कोम्मो, उसरी, भीतरीपानी और लालपूर्ज सहित कई गांवों में बीमारी के मामले सामने आए हैं।
मछुरदा ग्राम के सरपंच पति श्रीराम तिलगाम ने स्थानीय स्तर पर तीन से अधिक बच्चों की मौत का दावा किया है। उनके अनुसार, मछुरदा में एक, कुडेकसा में एक, मातला में छह, बोदारी में दो और लिम्होटी में एक बच्चे की मौत की जानकारी मिली है। हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि स्वास्थ्य विभाग की ओर से नहीं की गई है।
स्थानीय दावों और सरकारी आंकड़ों के बीच अंतर ने चिंता और बढ़ा दी है। ऐसे में प्रभावित गांवों में घर-घर सर्वे, प्रत्येक मृत्यु का मेडिकल ऑडिट, बीमारी के कारणों की जांच और संदिग्ध मामलों की स्क्रीनिंग तत्काल जरूरी है।
सीएमएचओ डॉ. परेश उपलब ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित गांवों का दौरा कर रही हैं और स्वास्थ्य शिविर लगाकर उपचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एम्बुलेंस की उपलब्धता और मौतों से जुड़े आंकड़ों के संबंध में मैदानी कर्मचारियों से वास्तविक स्थिति की जानकारी प्राप्त की जाएगी।
अब सवाल यह है कि आखिर इन गांवों में बच्चों के बीच बीमारी फैलने का कारण क्या है? क्या यह किसी संक्रामक बीमारी का प्रकोप है, पर्यावरणीय कारण है या कोई अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या? इसका जवाब विशेषज्ञ जांच के बाद ही सामने आएगा।
फिलहाल, जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग प्रभावित गांवों में युद्धस्तर पर स्वास्थ्य सर्वेक्षण, पर्याप्त मेडिकल कैंप, जांच की सुविधा और आपातकालीन परिवहन उपलब्ध कराए, ताकि बीमारी की वास्तविक वजह सामने आ सके और किसी भी संभावित बड़े स्वास्थ्य संकट को समय रहते रोका जा सके।
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This report presents reported symptoms and official statements; medical causes and death figures remain subject to verification through competent health authorities and investigation.