बालाघाट में छह बैगा गांव गोद लेकर पत्रकार संघ ने निभाया फ़र्ज़, अब सरकार की बारी.
Journalists’ Union Adopts Six Baiga Villages in Balaghat, Does Its Duty; Now It’s the Government’s Turn.

MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल।
विशेष संवाददाता, आनंद ताम्रकार, बालाघाट।
बालाघाट। दक्षिण बैहर का बैगा-बाहुल्य ग्राम जगला आज बयानों से ज़्यादा उन सवालों के कारण चर्चा में है, जो सीधे आदिवासी बच्चों की ज़िंदगी से जुड़े हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के 1 अक्टूबर को गांव पहुंचने के बाद सियासी बयानबाज़ी तेज़ हुई, पर असली सवाल दबता जा रहा है। जिस गांव से बच्चों की बीमारी से मौत की ख़बरें आईं, वहां स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और राशन दुकान आज तक क्यों नहीं हैं?
बालाघाट प्रशासन के अनुसार इन क्षेत्रों में अब तक 32 बच्चों की मौत हुई है, जबकि बैहर विधायक संजय उइके 45 मौतों का दावा करते हैं। एक ही संकट पर सरकारी और जनप्रतिनिधि के आंकड़ों में इतना अंतर बताता है कि फाइलों और ज़मीनी हकीकत के बीच खाई कितनी गहरी है।
चार मौतें रिकॉर्ड से बाहर, मदद भी नहीं
स्थानीय जानकारी के अनुसार जगला में पांच माह की सरस्वती, 20 दिन के आबित, दो माह की नीलम और एक माह के बिस्तु की मौत हुई। ग्रामीणों का कहना है कि इन मौतों की सूचना प्रशासनिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो सकी और परिवारों को शासन की आर्थिक सहायता नहीं मिली।
अगर यह सही है, तो सवाल सीधा है: मौतें हुईं, तो सूचना सरकारी फाइलों तक क्यों नहीं पहुंची? और पात्र परिवार अपने हक़ से वंचित क्यों रहे? राहुल गांधी ने इन परिवारों से मिलकर 50-50 हजार रुपये के चेक दिए। इसे सिर्फ़ सियासी चश्मे से देखना उचित नहीं, पर यह भी सच है कि जो ज़िम्मेदारी व्यवस्था की थी, उसकी भरपाई किसी नेता के चेक से नहीं हो सकती।
साढ़े चार किलोमीटर की दूरी, दशकों का फ़ासला
नव्ही से जगला की दूरी लगभग साढ़े चार किलोमीटर है, पर पहाड़ी और बदहाल रास्ता इसे बेहद कठिन बना देता है। बारिश में हालात और बिगड़ते हैं। बीमार को अस्पताल पहुंचाना, राशन लेने जाना या बाज़ार तक पहुंचना, हर काम एक चुनौती है। गांव में न स्कूल है, न स्वास्थ्य केंद्र, न राशन दुकान।
सात माह का लोकेश बैगा भी चर्चा में है। राहुल गांधी की गोद में उसकी तस्वीर वायरल हुई। उसकी मां बम्मनि बाई के अनुसार बड़ी बेटी की बीमारी से मौत हो चुकी है और लोकेश निमोनिया से जूझ चुका है। मां ने बेटे का नाम राहुल गांधी रखने की बात कही। लेकिन वायरल तस्वीरों से सड़क नहीं बनती और दवाइयां नहीं पहुंचतीं।
पत्रकार संघ ने छह गांव गोद लिए, अब सरकार की बारी
मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ ने जगला सहित कोरका, बोंदारी, अडोरी, कुंडेकसा और तबलुटोला को गोद लेने का निर्णय लिया है। जगला और तबलुटोला में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को साड़ी, खाद्य सामग्री, दैनिक उपयोग की वस्तुएं और प्राथमिक उपचार की दवाइयां बांटी गईं। ग्रामीणों ने सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, राशन और रोज़गार की समस्याएं सामने रखीं। जिलाध्यक्ष इंद्रजीत भोज ने कहा कि पत्रकारिता का दायित्व अंतिम व्यक्ति की आवाज़ शासन तक पहुंचाना भी है।
यह पहल सराहनीय है, पर राहत सामग्री सरकार की जवाबदेही का विकल्प नहीं। अब सवाल शासन और प्रशासन से हैं। क्या जगला जैसे गांवों को स्थायी स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और खाद्य सुरक्षा मिलेगी? क्या बच्चों की मौत के असली कारणों की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या जिन परिवारों तक सहायता नहीं पहुंची, उन्हें उनका हक़ मिलेगा?
जगला को ‘राजनीतिक पर्यटन’ कहकर बहस ख़त्म करना आसान है। मुश्किल यह स्वीकार करना है कि बच्चों की मौत के बाद ही देश का ध्यान गया, तो उससे पहले वहां की व्यवस्था आख़िर कहां थी?
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