कागजों में 17 एंबुलेंस, सड़क पर सिर्फ 7? कटनी में प्रसूता की मौत.
17 Ambulances on Paper, Only 7 on the Road? Pregnant Woman Dies in Katni.

Special Correspondent, Katni, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, कटनी/भोपाल। कटनी। नौ महीने तक मां अपनी कोख में बच्चे को पालती है। परिवार जिस पल का बेसब्री से इंतजार करता है, वही पल अगर स्वास्थ्य व्यवस्था की कथित बदहाली और आपातकालीन सेवाओं की देरी के कारण मातम में बदल जाए, तो सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है।
कटनी जिले में 24 वर्षीय प्रसूता गुलाब बाई कोल की मौत ने स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ढीमरखेड़ा तहसील के खमरिया गांव की रहने वाली गुलाब बाई को प्रसव पीड़ा के बाद कथित तौर पर करीब दो घंटे तक 108 जननी एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ा। निजी वाहन से स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के बाद उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां परिजनों के अनुसार तत्काल उपचार शुरू होने में भी देरी हुई। अस्पताल की दहलीज पर ही उसने दम तोड़ दिया। मामले में कटनी कलेक्टर आशीष तिवारी ने जांच और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की बात कही है।
दो घंटे एंबुलेंस का इंतजार, फिर अस्पताल में भी कथित देरी
मृतका के पति मोजन कोल के अनुसार, प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद परिजनों ने 108 जननी एक्सप्रेस से संपर्क किया। उन्हें वाहन भेजने का आश्वासन मिलता रहा, लेकिन कथित तौर पर दो घंटे तक एंबुलेंस नहीं पहुंची।
आखिरकार परिजनों को निजी वाहन का सहारा लेना पड़ा। खमतरा स्वास्थ्य केंद्र में प्राथमिक उपचार के बाद गुलाब बाई को जिला अस्पताल रेफर किया गया। परिजनों का आरोप है कि जिला अस्पताल पहुंचने के बाद भी तत्काल उपचार शुरू करने के बजाय उन्हें प्रक्रियाओं और अलग-अलग कमरों के चक्कर लगाने पड़े।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—आपात स्थिति में अस्पताल पहुंची प्रसूता के लिए इलाज पहले होना चाहिए या कागजी प्रक्रिया?
कागजों में एंबुलेंस, जमीन पर कितनी उपलब्ध?
रिपोर्ट के अनुसार कटनी जिले के लिए 17 जननी इमरजेंसी वाहन आवंटित होने की बात कही गई है, जबकि मौके पर केवल 7 वाहनों के संचालित होने का दावा सामने आया है। यदि यह आंकड़ा सही है, तो शेष वाहनों की स्थिति और उनके संचालन को लेकर स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट जवाब देना होगा।
ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं के लिए एंबुलेंस कोई सुविधा नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाली आपातकालीन कड़ी है। ऐसे में वाहन की उपलब्धता, रिस्पॉन्स टाइम और अस्पताल में तत्काल उपचार—तीनों की जवाबदेही तय होना जरूरी है।
एक मौत नहीं, पूरी व्यवस्था की परीक्षा
यदि जांच में एंबुलेंस की देरी या अस्पताल स्तर पर उपचार में लापरवाही की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सवाल यह भी होना चाहिए कि आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी कौन कर रहा था और व्यवस्था में कमी पहले क्यों नहीं पकड़ी गई?
कटनी में गुलाब बाई की मौत की निष्पक्ष जांच सिर्फ एक परिवार को न्याय दिलाने का मामला नहीं है। यह तय करने की परीक्षा भी है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में प्रसूता की जिंदगी कागजों से ज्यादा महत्वपूर्ण है या नहीं।
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