22 एथेनॉल प्लांट, 17 गिरफ्तार! फिर बाकी 21 पर जांच कब? सरकारी चावल कांड में बड़ा सवाल.
22 Ethanol Plants, 17 Arrests! When Will the Other 21 Face Investigation? A Major Question in the Government Rice Scam.

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। मध्यप्रदेश में एथेनॉल उत्पादन के लिए सरकारी चावल आवंटन से जुड़ा मामला अब बालाघाट से निकलकर प्रदेशव्यापी सवालों के घेरे में पहुंचता दिखाई दे रहा है। बालाघाट में सामने आए मामले में एसआईटी की जांच के दौरान करीब 17 हजार मीट्रिक टन चावल के आवंटन और उसमें से 5,459 मीट्रिक टन चावल के कथित रूप से गायब होने का मामला सामने आया है। जांच के दौरान अब तक 17 आरोपियों की गिरफ्तारी और 26 ट्रकों की जब्ती की जानकारी सामने आई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—जब प्रदेश के 17 जिलों में 22 एथेनॉल प्लांटों को सरकारी चावल जारी किया गया था, तो क्या बाकी प्लांटों में भी आवंटन, परिवहन और उपयोग की स्वतंत्र जांच होगी?
बालाघाट प्रकरण में सामने आए तथ्यों ने एफसीआई, राइस मिलर्स, परिवहनकर्ताओं और एथेनॉल प्लांट से जुड़े लोगों की भूमिका को जांच के केंद्र में ला दिया है। हालांकि, किसी व्यक्ति या संस्था की आपराधिक भूमिका अदालत में प्रमाणित होने तक उसे दोषी नहीं माना जा सकता।
22 एथेनॉल प्लांट, लेकिन जांच का दायरा अभी सीमित क्यों?
जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के मुरैना, खरगोन, छिंदवाड़ा, बैतूल, ग्वालियर, धार, सतना, बालाघाट, रायसेन, मंदसौर, पांढुर्ना, बड़वानी, नर्मदापुरम, मंडला, जबलपुर, शहडोल और हरदा जिलों में एथेनॉल प्लांट संचालित हैं।
इनमें छिंदवाड़ा में तीन, जबकि मुरैना, धार और बालाघाट में दो-दो प्लांट बताए गए हैं। शेष जिलों में एक-एक प्लांट होने की जानकारी है।
यही आंकड़ा अब जांच के दायरे को लेकर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि एक प्लांट से जुड़े आवंटन की जांच में हजारों मीट्रिक टन चावल की कथित गड़बड़ी सामने आती है, तो अन्य प्लांटों में जारी चावल का रिकॉर्ड, उठाव, परिवहन, उपयोग और अंतिम स्टॉक का मिलान क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
फिलहाल बालाघाट एसआईटी की जांच का मुख्य केंद्र एवीजे एथेनॉल प्लांट को जारी करीब 17 हजार मीट्रिक टन चावल से जुड़ा मामला बताया जा रहा है।
‘एथेनॉल के नाम पर चावल’, फिर राइस मिल तक कैसे पहुंचा?
मामले की शुरुआत नवेगांव स्थित एफसीआई गोदाम से एथेनॉल प्लांट के लिए निकले तीन ट्रकों से जुड़े घटनाक्रम से हुई। जानकारी के अनुसार इनमें से एक ट्रक वारासिवनी स्थित संचेती राइस मिल में मिला, जिसमें करीब 242 क्विंटल चावल लदा था। दो अन्य ट्रकों के सिवनी स्थित नंदगोपाल राइस इंडस्ट्रीज में मिलने की जानकारी सामने आई।
यहीं से सरकारी चावल की आवाजाही को लेकर जांच आगे बढ़ी और राइस मिलर्स, परिवहनकर्ताओं तथा एथेनॉल प्लांट से जुड़े लोगों की भूमिका की पड़ताल शुरू हुई।
जांच के दौरान एसआईटी द्वारा अलग-अलग आरोपियों की गिरफ्तारी और ट्रकों की जब्ती की गई। अब जांच एजेंसी के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चावल की सरकारी गोदाम से निकलने से लेकर उसके अंतिम उपयोग तक पूरी सप्लाई चेन में कौन-कौन शामिल था?
सिर्फ परिवहन रिकॉर्ड ही नहीं, बल्कि स्टॉक रजिस्टर, बिल, ई-वे बिल, बैंक लेन-देन, मिलिंग रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों का मिलान इस मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
17 गिरफ्तारियां, 26 ट्रक जब्त—फिर ‘बड़े नामों’ पर सवाल क्यों?
एसआईटी की कार्रवाई में अब तक एवीजे एथेनॉल प्लांट के प्रतिनिधि राहुल प्रताप, सुपरवाइजर राकेश श्रीवास्तव, ट्रक चालक दुर्गेश शेंडे, ट्रांसपोर्टर उबेद खान, विभिन्न राइस मिलों से जुड़े संचालक एवं कर्मचारी तथा एफसीआई से जुड़े कर्मचारी सहित 17 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है।
इसी क्रम में हर्ष राइस मिल से जुड़े अविनाश कावरे, विनोद शर्मा और गोपाल ठाकुर की गिरफ्तारी भी हुई है।
हर्ष राइस मिल के राजनीतिक कनेक्शन को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। रिपोर्ट में भाजपा जिला अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री रामकिशोर कावरे के परिवार से जुड़े होने का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी राजनीतिक या पारिवारिक संबंध मात्र से किसी व्यक्ति की आपराधिक भूमिका साबित नहीं होती।
यही वजह है कि इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल कार्रवाई की समानता को लेकर है—क्या जांच में जिन लोगों के खिलाफ साक्ष्य मिलेंगे, उनके पद, राजनीतिक प्रभाव या कारोबारी हैसियत से अलग समान कानूनी कार्रवाई होगी?
कुमार कावरे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके खिलाफ कार्रवाई की पुष्टि इस रिपोर्ट के स्तर पर नहीं है। इसलिए उनकी भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसी के साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
असली परीक्षा अब ‘सिस्टम’ की—क्या बाकी प्लांटों का भी होगा ऑडिट?
बालाघाट मामले ने केवल एक कथित चावल हेराफेरी की जांच को जन्म नहीं दिया है, बल्कि सरकारी खाद्यान्न की पूरी आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।
यदि जांच में यह स्थापित होता है कि निर्धारित उद्देश्य के लिए जारी चावल का डायवर्जन हुआ, तो जिम्मेदारी केवल अंतिम स्तर पर चावल प्राप्त करने वालों तक सीमित नहीं रह सकती। आवंटन, उठाव, परिवहन, स्टॉक सत्यापन, दस्तावेजी प्रक्रिया और भुगतान—हर स्तर की भूमिका की जांच जरूरी होगी।
इसीलिए अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या संबंधित एजेंसियां प्रदेश के अन्य एथेनॉल प्लांटों को जारी चावल का भी फॉरेंसिक स्टॉक ऑडिट और दस्तावेजी मिलान कराएंगी।
क्योंकि अगर एक प्लांट की जांच में हजारों मीट्रिक टन चावल का हिसाब सवालों के घेरे में आ सकता है, तो बाकी 21 प्लांटों का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक जांच की कसौटी पर क्यों नहीं परखा जाना चाहिए?
बालाघाट की जांच अब केवल चावल की बरामदगी का मामला नहीं रह गई है। यह सरकारी खाद्यान्न की निगरानी, एफसीआई की जवाबदेही, मिलिंग व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता की बड़ी परीक्षा बन चुकी है।
अब असली सवाल यही है—क्या एसआईटी जांच की अगली कड़ी उन सभी स्तरों तक पहुंचेगी, जहां से सरकारी चावल की आवाजाही नियंत्रित होती है, या फिर कार्रवाई कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित रह जाएगी?
Legal Disclaimer
This report presents allegations and investigation details; no person or organization is guilty unless proven through evidence and final judicial determination.