धान सड़ती रही, जिम्मेदारी टलती रही! कटनी मंडी में सरकारी अनाज पर बड़ा सवाल.
The Paddy Kept Rotting, While Accountability Kept Being Delayed! Big Questions Over Government Grain at Katni Mandi.

Special Correspondent, Katni, MP Samwad News
MP संवाद समाचार, कटनी/भोपाल। कटनी कृषि उपज मंडी के शेड क्रमांक-2 में वर्षों से रखी करोड़ों रुपये मूल्य की धान के खराब होने का मामला सामने आया है। आरोप है कि लंबे समय तक धान के उचित रखरखाव, नीलामी अथवा नियमानुसार निस्तारण की दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि सरकारी धान खराब होकर सड़ने लगी और अब मंडी परिसर के आसपास दुर्गंध फैलने की शिकायत सामने आ रही है।
मामले में मध्यप्रदेश राज्य नागरिक आपूर्ति निगम लिमिटेड (नान) और कृषि उपज मंडी से जुड़े अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मामले को लेकर कलेक्टर कटनी से शिकायत कर जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है। शिकायत के बाद जांच शुरू होने की जानकारी सामने आई है।
शेड में धान, लेकिन जिम्मेदारी किसकी?
प्राप्त जानकारी के अनुसार मंडी के शेड क्रमांक-2 में लगभग दो से तीन वर्ष पूर्व बड़ी मात्रा में धान रखवाई गई थी। बताया जाता है कि यह धान तत्कालीन कलेक्टर अवि प्रसाद के कार्यकाल के दौरान नान विभाग द्वारा मंडी परिसर में रखवाई गई थी।
सवाल यह है कि जब सरकारी अनाज को मंडी परिसर में रखा गया था, तो उसकी नियमित निगरानी, भंडारण की स्थिति और गुणवत्ता की जांच कौन कर रहा था?
यदि धान लंबे समय तक उपयोग, मिलिंग, नीलामी अथवा अन्य नियमानुसार निस्तारण की प्रतीक्षा में थी, तो समय रहते विभागीय स्तर पर निर्णय क्यों नहीं लिया गया?
न नीलामी, न उचित रखरखाव—अब सड़ने लगी धान!
आरोप है कि लंबे समय तक धान का उचित रखरखाव नहीं किया गया और न ही उसके निस्तारण या नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसके चलते धान खराब होने की स्थिति में पहुंच गई।
अब खराब धान से निकल रही दुर्गंध को लेकर आसपास के लोगों में चिंता है। शिकायतकर्ताओं ने आशंका जताई है कि सड़ते अनाज के कारण स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
हालांकि, दुर्गंध या स्वास्थ्य जोखिम के संबंध में अंतिम स्थिति स्वास्थ्य एवं संबंधित तकनीकी विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
कटनी में हर साल हजारों किसानों से खरीदी जाती है धान
कटनी जिले में समर्थन मूल्य पर हर वर्ष बड़ी मात्रा में धान का उपार्जन किया जाता है। शासन के निर्देशानुसार दिसंबर-जनवरी के दौरान निर्धारित उपार्जन केंद्रों के माध्यम से किसानों से धान खरीदी जाती है और भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में किया जाता है।
वर्ष 2025-26 में जिले में लगभग 4 लाख मीट्रिक टन धान के उपार्जन की जानकारी दी गई है। उपार्जन के बाद धान का भंडारण सरकारी एवं निजी वेयरहाउस में किया जाता है और शासन के निर्देशानुसार आगे मिलिंग की प्रक्रिया होती है।
ऐसे में यदि इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी धान वर्षों तक किसी शेड में पड़ी रही और खराब हो गई, तो यह केवल भंडारण का मामला नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति के संरक्षण और जवाबदेही का भी विषय बन जाता है।
करोड़ों की सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ तो जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जांच में धान के खराब होने की पुष्टि होती है और इससे शासन को आर्थिक नुकसान हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
क्या धान के भंडारण की नियमित निगरानी की गई थी?
क्या गुणवत्ता परीक्षण कराया गया था?
धान के निस्तारण या नीलामी को लेकर कोई विभागीय प्रक्रिया शुरू हुई थी?
यदि नहीं, तो देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?
इन सवालों का जवाब नान, कृषि उपज मंडी और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है।
शिकायत के बाद जांच शुरू, अब रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
मामले में कलेक्टर आशीष तिवारी से शिकायत कर उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। जानकारी के अनुसार शिकायत के बाद जांच प्रक्रिया शुरू हो गई है।
इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अब असली परीक्षा जांच की है। यदि धान वास्तव में वर्षों तक लापरवाही के कारण खराब हुई है, तो केवल धान हटाने या निस्तारण से मामला खत्म नहीं होना चाहिए। धान कब रखी गई, किसकी निगरानी में रही, खराब होने तक क्या कार्रवाई हुई और शासन को कितना नुकसान हुआ—इन सभी बिंदुओं की जांच के बाद जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
MP संवाद के सवाल
सरकारी धान को वर्षों तक शेड में रखने की जरूरत क्यों पड़ी?
उसकी नियमित निगरानी किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी?
समय रहते नीलामी या निस्तारण क्यों नहीं हुआ?
यदि सरकारी नुकसान हुआ है तो उसकी भरपाई और जिम्मेदारी किससे तय होगी?
अब देखना होगा कि जांच सिर्फ खराब धान के निस्तारण तक सीमित रहती है या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी तय की जाती है।
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