बाघ बढ़े, जंगल घटे! बालाघाट में ‘टाइगर बनाम टेरिटरी’ का संकट कितना बड़ा?
Tigers Increase, Forests Shrink! How Big Is the ‘Tiger vs Territory’ Crisis in Balaghat?

Special Correspondent, Anand Tamrakar, Balaghat, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार, बालाघाट/भोपाल। मध्य प्रदेश को ‘टाइगर स्टेट’ का दर्जा यूं ही नहीं मिला। राज्य में बाघों की संख्या बढ़ रही है और बालाघाट का जंगल इस बढ़ती आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास बनकर उभर रहा है। लेकिन इस सफलता की कहानी का दूसरा पहलू भी है—जंगल का सिकुड़ता दायरा, बढ़ता खनन, सड़क निर्माण और मानव-वन्यजीव संघर्ष।
कान्हा और पेंच के बीच स्थित बालाघाट का वन क्षेत्र लंबे समय से वन्यजीवों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। अब दक्षिण बालाघाट के जंगलों में बाघों और तेंदुओं की मौजूदगी इस बात का संकेत दे रही है कि यह इलाका केवल ‘कॉरिडोर’ नहीं, बल्कि बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास भी बन रहा है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब बाघ बढ़ रहे हैं तो क्या उनके लिए पर्याप्त सुरक्षित टेरिटरी भी बच रही है?
दक्षिण बालाघाट में बढ़ी बाघों की मौजूदगी, कैमरा ट्रैप ने खोली जंगल की तस्वीर
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग से जुड़ी उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी वन क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप के माध्यम से वन्यजीवों की निगरानी की गई थी।
नवंबर 2021 में 71 कैमरा ट्रैप लगाए गए और करीब 215 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 25 दिनों तक निगरानी की गई। इस दौरान कैमरों में बड़ी संख्या में बाघ और तेंदुओं की तस्वीरें रिकॉर्ड हुईं। उपलब्ध अध्ययन के आधार पर 18 अलग-अलग बाघों और 27 तेंदुओं की पहचान की गई थी।
कैमरा ट्रैप में बाघ और तेंदुओं के अलावा भेड़िया, सियार, स्लॉथ बेयर, गौर, सांभर, चीतल, नीलगाय, बार्किंग डियर और साही सहित कई अन्य वन्यजीव भी रिकॉर्ड हुए। यह संकेत देता है कि दक्षिण बालाघाट का वन क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
यानी तस्वीर साफ है—बालाघाट के जंगल वन्यजीवों के लिए सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि घर बनते जा रहे हैं।
लेकिन इसी के साथ जंगल पर दबाव भी बढ़ रहा है।
बाघ बढ़े तो टेरिटरी का संकट भी बढ़ा! खेतों तक पहुंच रहे जंगल के राजा
बाघों की आबादी बढ़ना संरक्षण की दृष्टि से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन हर नए बाघ को अपने अस्तित्व के लिए एक सुरक्षित क्षेत्र की जरूरत होती है। जैसे-जैसे वयस्क बाघ अपनी नई टेरिटरी तलाशते हैं, उनके जंगल से बाहर निकलकर खेतों और मानव बस्तियों के करीब पहुंचने की संभावना भी बढ़ सकती है।
यहीं से शुरू होता है मानव-वन्यजीव संघर्ष।
बालाघाट में बाघों की बढ़ती मौजूदगी के साथ मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएं चिंता का विषय बन रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों पर हमले, खेतों में बाघों की मौजूदगी और मानव जीवन को लेकर भय का माहौल इस समस्या को और गंभीर बनाता है।
दूसरी ओर, टेरिटोरियल फाइट यानी क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई भी बाघों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। जंगल में जगह सीमित होने पर बाघों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका रहती है।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि बालाघाट में कितने बाघ हैं?
सवाल यह भी है कि क्या उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित जंगल बचा है?
खनन और सड़क परियोजनाओं से बढ़ता दबाव, वन्यजीवों के भविष्य पर बड़ा सवाल
बालाघाट खनिज संपदा से समृद्ध जिला है। जिले में पहले से ही विभिन्न क्षेत्रों में खनन गतिविधियां संचालित होती रही हैं। इसके साथ सड़क निर्माण और भारी वाहनों की आवाजाही भी वन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा सकती है।
खनन का प्रभाव केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता जहां खुदाई होती है। खनन से जुड़ी सड़कें, परिवहन, ध्वनि प्रदूषण और मानवीय गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकती हैं।
यदि जंगल के बड़े हिस्से आपस में कट जाते हैं, तो वन्यजीवों के आवागमन के रास्ते बाधित हो सकते हैं। इसका सीधा असर बाघों और तेंदुओं जैसे बड़े मांसाहारी वन्यजीवों पर पड़ सकता है।
बालाघाट में प्रस्तावित या संचालित खनन गतिविधियों को लेकर पर्यावरणीय प्रभावों की वैज्ञानिक समीक्षा इसलिए बेहद जरूरी है। किसी भी परियोजना को मंजूरी देने से पहले यह देखना आवश्यक है कि उसका असर वन्यजीवों के आवास, कॉरिडोर और स्थानीय जैव विविधता पर कितना पड़ेगा।
क्योंकि अगर जंगल का रास्ता बंद हुआ, तो बाघ रास्ता बदलेंगे—और वह रास्ता खेतों या गांवों से होकर भी गुजर सकता है।
बाघ बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या सरकार के पास ‘फ्यूचर प्लान’ है?
टाइगर स्टेट का तमगा सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ाने से कायम नहीं रहेगा। असली चुनौती अब इन बाघों के लिए सुरक्षित आवास, पर्याप्त टेरिटरी और निर्बाध वन्यजीव कॉरिडोर बचाने की है।
वन विभाग के सामने अब एक साथ कई मोर्चे हैं—मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकना, अवैध शिकार पर नियंत्रण, सड़क और खनन परियोजनाओं के प्रभाव को सीमित करना और वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के रास्तों को संरक्षित रखना।
बालाघाट में बाघों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से गौरव की बात है। लेकिन यदि जंगल लगातार सिकुड़ते गए और वन्यजीवों के आवास पर दबाव बढ़ता गया, तो यही सफलता भविष्य में संघर्ष का कारण भी बन सकती है।
अब जरूरत सिर्फ बाघों की गिनती करने की नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित भविष्य की गारंटी देने वाले ठोस रोडमैप की है।
क्योंकि सवाल आज का नहीं, आने वाली पीढ़ियों का है—
क्या बालाघाट के जंगल बाघों के लिए सुरक्षित रहेंगे, या विकास की दौड़ में ‘टाइगर स्टेट’ का सबसे बड़ा संकट खुद उसके जंगल बन जाएंगे?
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