नोटिसों की फाइल में दबा फायर खतरा—कटनी स्कूल में आग ने खोली पोल.
Fire Risk Buried in Files of Notices — Blaze at Katni School Exposes the Truth.

Special Correspondent, Harishankar Parashar, Katni, MP Samwad News.
MP संवाद समाचार | कटनी
कटनी के जेपीव्ही डीएवी पब्लिक स्कूल में हुई भीषण आगजनी ने एक बार फिर शिक्षा संस्थानों में सुरक्षा मानकों की पोल खोल दी है। यह घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि वर्षों से जारी लापरवाही, नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक ढिलाई का खतरनाक परिणाम है।
तीन साल से मिल रहे थे नोटिस, फिर भी नहीं लगी फायर सेफ्टी!
नगर निगम के रिकॉर्ड चौंकाने वाले हैं।
स्कूल प्रबंधन को बार-बार चेतावनी दी गई, लेकिन हर बार सिर्फ कागजी खानापूर्ति की गई:
- 18 सितंबर 2023
- 19 दिसंबर 2023
- 20 दिसंबर 2024
- 17 अप्रैल 2026
अंतिम नोटिस में स्पष्ट लिखा था कि 1 जुलाई 2024 को फायर प्लान स्वीकृत होने के बावजूद सुरक्षा उपकरण नहीं लगाए गए।
यह सीधा-सीधा नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) की अवहेलना और बच्चों की जान से खिलवाड़ है।
बड़े नाम’ पर प्रशासन की चुप्पी?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
अगर यही घटना किसी छोटे स्कूल में होती, तो क्या प्रशासन इतना ही शांत रहता?
भारी फीस और डोनेशन लेने वाली बड़ी संस्था पर अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई।
क्या “ट्रिपल इंजन सिस्टम” यहां फेल हो गया?
जिम्मेदार कौन? उठ रहे बड़े सवाल
- फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट के लिए समय पर आवेदन क्यों नहीं किया गया?
- चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- “विपरीत स्थिति में कार्रवाई” की धमकी सिर्फ कागजों तक क्यों सीमित रही?
हादसे के 24 घंटे बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी संदेह को और गहरा रही है।
अभिभावकों में गुस्सा: ‘बाल-बाल बचे बच्चे’
घटना के बाद अभिभावकों में भारी आक्रोश है।
उनका कहना है कि यदि दमकल विभाग समय पर नहीं पहुंचता, तो कंप्यूटर लैब से शुरू हुई आग पूरे स्कूल को निगल सकती थी।
कड़े प्रावधान, लेकिन कार्रवाई शून्य!
नियमों के अनुसार इस तरह की लापरवाही पर:
- स्कूल की मान्यता रद्द हो सकती है
- भवन को असुरक्षित घोषित कर सील किया जा सकता है
- भारी जुर्माना लगाया जा सकता है
- प्रबंधन के खिलाफ FIR दर्ज हो सकती है
- बिजली आपूर्ति तक रोकी जा सकती है
लेकिन हैरानी की बात—अब तक कुछ भी नहीं हुआ!
प्रशासन बंधक या सिस्टम फेल?’
जनचर्चा में यह मामला अब सिर्फ स्कूल की लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता और दोहरे मापदंड का प्रतीक बन चुका है।
लोग सवाल उठा रहे हैं—
जहां एक ओर मामूली मामलों में सख्ती दिखाई जाती है, वहीं हजारों बच्चों की जान खतरे में डालने वालों पर खामोशी क्यों?
क्या होगी कार्रवाई या फिर दब जाएगा मामला?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या इस गंभीर लापरवाही पर ठोस कार्रवाई होगी, या यह मामला भी नोटिसों की फाइलों में दबकर रह जाएगा?
अगर जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ एक स्कूल का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का प्रमाण बन जाएगा।